Shri Ram Dvara Vanar Bhoj

संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से………

एक बार श्री रामचन्द्र जी (Shri Ram Ji) ने हनुमानजी से कहा: हनुमान ! राज्याभिषेक के बाद सबको यथा योग्य सम्मान तो मिला, किंतु अभी भी मेरे मन में एक इच्छा है कि इन वानरों को पंगत में बिठाकर भोजन करवाऊँ।”

हनुमानजी (Hanuman Ji) ने हाथ जोड़कर कहा : “प्रभु। इन वनारों को मैं खूब जानता हूं, इन्हें तो वृक्षों पर ही कूदने दीजिये।”

“परंतु, हनुमान! मेरी इच्छा है कि इन्हें मानवों की तरह भोजन कराऊँ।”

भगवान की इच्छा जानकर हनुमानजी ने कहा: “प्रमु! जो आपकी आज्ञा।”

प्रभु श्री राम जी (Shri Ram ji) आदेश नहीं देते कि ‘मेरा आदेश है।’ नहीं, वरन इच्छा व्यक्त करते कि मेरी इच्छा है। आप भी अगर नेता हैं , आगेवान हैं , संचालक या नियंत्रक हैं तो अपने से जो छोटे हैं उनको प्रेम और प्रोत्साहन देकर आदेश दोगे तो काम अच्छा होगा और यदि कठोरता से, उत्साह भंग करके हिटलर की तरह आदेश दोगे तो कार्य में बरकत नहीं आयेगी।

श्री राम जी के कहने पर हनुमान जी वानर – भोज की व्यवस्था में लग गये। नियत दिन, नियत समय पर वानरों की टुकड़ी आ गयी । हनुमानजी ने वानरों से कहा : मेरी पद्धति से पत्तलों पर भोजन करना है, सबको पंक्ति में बैठना पड़ेगा।

एक बंदर इधर कूदे तो दूसरा उधर……उन्हें पंक्ति में बिठाते – बिठाते हनुमानजी सिर खुजलाने लगे कि “हे प्रभू ! इनको पंक्ति में कैसे बिठाया जाए ? इनको तो गोलाकार बैठने की आदत है।”

आखिर हनुमानजी ने जमीन पर पैर से एक लकीर खींची और कहा : ‘सब इस लकीर के किनारे- किनारे बैठ जाओ।’

सारे बंदर पंक्ति में बैठ गए ।सबसे पहले उन्हें पत्तले दी गई। कछ बंदर पत्तलों को हाथ में लेकर इधर- उधर देखने लगे तो कुछ सिर पर रखने लगे। हनुमानजी ने कहा :’कोई सिर पर पत्तल नहीं रखेगा।’

बंदरों ने पत्तलें नीचे रख दी। हनुमानजी बंदरों को निर्देश देते जा रहे थे,अतः वे सभी सावधान थे।

भोजन परोसा जाने लगा। ज्यों ही पहला पकवान परोसा गया, सभी बंदर उसे खाने को उध्यत हुए। हनुमानजी ने कहा : ‘नहीं, नहीं। अभी नहीं। सब परोसने दो, बाद में भोजन आरंभ करना। खबरदार!’

परोसते-परोसते कंद-मुल परोसने की बारी आयी। आखिर में पके आम परोसे गये । बंदरों को आम बहुत पसंद होते हैं। कितु हनुमान जी का कड़क अनुशासन था, फिर कैसे खाएं ? फिर भी एक बंदर ने चुपके से पैरों से आम उठाया और दबाकर मुंह में डालने का प्रयास किया तो उसकी गुठली उछलकर सामनेवाले बंदर की नाक पर जोर से जा लगी। सब बंदर हुप-हुप करने लगे और आम उठाकर पेडों पर जा चढे। सारा भोजन वहीं धरा रह गया….

श्री रामचन्द्रजी मंद-मंद मुसकराये । हनुमानजी ने कहा। “प्रभू! मैं तो पहले ही कहता था कि वानर- भोज रहने दे ।”

श्री राम ने कहा “नहीं हनुमान! जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा ही हो रहा है, जो होगा अच्छा ही होगा। संकोच छोड़ो। हनुमान! तुम्हारे जाति-भाइयों के इस प्रसंग को याद करके लोग प्रसन्न होंगे, अपना खून बढायेंगे।” यह सुनकर हनुमानजी आनंदित हुए। इसे पढ़कर हम-तुम भी आनंदित हो रहे हैं। यही तो सच्चिदानंद की रीत है।

श्रीराम-राज्याभिषेक के वर्णन में आता है कि उस समय सभीको परमानंद हुआ था। जीव का वास्तविक स्वभाव सच्चिदानंद, परमानंद है। श्री राम जी की राज्य-व्यवस्था से, उनके व्यवहार से और अभी अंतर्यामी श्रीरामचन्द्रजी से एकाकार होकर जीनेवाले महापुरुषों के व्यवहार से अपने सच्चिदानंद के व्यवहार की झलके मिलती हैं। ॐ आनंद…

~ऋषी प्रसाद