आत्महत्या के विचार आते हैं तो समझो यह मन की दुर्बलता व कायरता की पराकाष्ठा है । बचपन मे वीर्यनाश खूब हुआ हो तो बार-बार आत्महत्या के विचार आते हैं । वीर्यवान एवं संयमी पुरुष को आत्महत्या के विचार नही आते हैं ।

आत्महत्या का विचार वे ही लोग करते हैं जिनकी वीर्यग्रंथि प्रारम्भ में ही अत्याधिक वीर्यस्राव के कारण मजबूत
होने से पहले ही शिथिल एवं कमजोर हो गयी हो । यही कारण है कि हमारे देश की अपेक्षा परदेश में आत्महत्याएं
अधिक होती हैं । हमारे देश में भी पहले की अपेक्षा आजकल आत्महत्याएं  ज्यादा होने लगी हैं क्योंकि फ़िल्मों के कुप्रभाव से बच्चे-बच्चियाँ वीर्यस्राव आदि के शिकार हो रहे हैं ।

विद्यार्थियों का धर्म है ब्रह्मचर्य (Brahmachary) का पालन करना, नासाग्र दृष्टि रखना । पहले के जमाने में पाँच साल का होते ही बालक को गुरुकुल में भेज दिया जाता था । पच्चीस साल का होने तक वह  रहता था, ब्रह्मचर्य का पालन करता था, विद्याध्ययन एवं योगाभ्यास करता था । जब स्नातक वहीं होकर गुरुकुल से वापस आता तब देखो तो शरीर सुडौल एवं मजबूत…. कमर में मूँज की रस्सी बँधी हुई और उस रस्सी से लंगोट खींची हुई होती थी । वे जवान बड़े वीर, तंदुरुस्त एवं स्वस्थ होते थे ।
अश्लील फिल्मों, गंदे उपन्यासों एवं कुसंग ने आज नौजवानों के चरित्रबल का सत्यानाश कर दिया है ।

सावधान !

इन बुराइयों से बचो…. संयम की महिमा समझो…. एवं संत-महापुरुषों का संग करो…. ताकि पुनः अपने पूर्वजों जैसा आत्मबल, चरित्रबल एवं नैतिक बल अर्जित कर सको ।

– पूज्य संत श्री आशारामजी बापू की अमृतवाणी