“शुद्ध, सादे सूती वस्त्र स्वास्थ्य के लिए भी अच्छे हैं और आर्थिक ढंग से भी ठीक हैं। कपड़े पहनो अंगों की रक्षा करने के लिए, अंगों को बीमार करने के लिए नहीं। डॉक्टर डायमंड ने खोज करके घोषणा की कि जो सिंथेटिक कपड़े हैं वे जीवनशक्ति का ह्रास करते हैं। सूती कपड़े और ऊनी कपड़े जीवनीशक्ति का नुकसान नहीं करते।”

-पूज्य संत श्री आशारामजी बापू

➠ पूज्य बापू जी ने इसकी महत्ता एक प्रेरक प्रसंग के द्वारा बहुत ही सुंदर ढंग से बतायी है-

➠ “भारत का एक बालक कॉन्वेंट स्कूल से अपना नाम खारिज करवाकर भारतीय पद्धति से पढ़ने वाली शाला में भर्ती हो गया। उस बालक की बुद्धि गजब की थी, दृष्टि बड़ी पैनी थी। पहले ही दिन बालक की नजर प्रधानाचार्य के धोती-कुर्ते पर गयी। उस बालक ने विचार किया कि ‘हमारे प्रधानाचार्य धोती-कुर्ता पहनते हैं। स्वामी विवेकानंद जी भी धोती-कुर्ता और पगड़ी पहन कर विदेशों में गये और अपने देश की वेशभूषा पहनने पर भी वे विश्वविख्यात हुए तो मैं क्यों गुलामी की वेशभूषा पहनूँगा ?

➠ दूसरे दिन वह नन्हा बालक अपनी संस्कृति की वेशभूषा पहनकर अपने पिता को प्रणाम करने गया।

पिता ने कहाः “अरे, तूने यह क्या पहन लिया ?”

बालकः “पिताजी ! यह हमारी भारतीय वेशभूषा है। देश तब तक शाद-आबाद नहीं रहता जब तक हम अपनी संस्कृति और वेशभूषा का आदर नहीं करते। पिताजी ! मैंने कोई गलती तो नहीं की ?”

“बेटा! गलती तो नहीं की लेकिन ऐसा कैसे पहन लिया ?”

“पिता जी ! हमारे प्रधानाचार्य अपनी भारतीय वेशभूषा पहनते हैं। कोट-पैंट, शर्ट और टाई आदि ठंडे मुल्कों की आवश्यकता है। हमारा देश तो गर्म है। यहाँ तो खुली-खुली, ढीली-ढाली वेशभूषा होनी चाहिए। यह स्वास्थ्यप्रद है और हमारी संस्कृति की पहचान है।”

➠ पिता ने उस बालक को गले से लगायाः “बेटा ! तू होनहार लगता है। कोई तुझे अपने विचारों से दबा नहीं सकता। तू अपने विचारों को बुलंद रख। तेरी जय-जयकार होगी बेटा !”

➠ वही लड़का आगे चलकर नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के नाम से प्रसिद्ध हुआ और देश को आजाद कराने के कार्य में लगा।

➠ आजकल कई विद्यालयों कड़क इस्तरी किये हुए कपड़े पहनने को कहा जाता है। अरे, बच्चे अभी कड़क इस्तरी किये कपड़े पहनेंगे तो उनकी सरलता मर जायेगी और खर्च बढ़ जायेगा। माँ-बाप के लिए भार बन जायेंगे।

➠ हमने ऐसे-ऐसे लोगों को देखा जो अपने चौके में गाय के गोबर का लीपन किये बिना भोजन नहीं बनाते थे परंतु वे अमेरिका गये, हवाई जहाज में बैठे तो देखा कि “दूसरे लोग यह-वह खा रहे हैं, अपन नहीं खायेंगे तो भगतड़े कहे जायेंगे। चलो, थोड़ा खा लें।’ फिर वे अभी क्लबों में नाच रहे हैं, शराब पी रहे हैं और औरतें बदल रहे हैं। अरे, अपनी दृढ़ता होनी चाहिए। कुछ लोग सोचते हैं, ‘क्या करें, जरा बाहर जा रहे हैं। घर का तो कुर्ता है लेकिन जरा सफारी….’

➠ अरे, हमने तो विदेश जाकर कभी पहनावा नहीं बदला, अपना भोजन नहीं बदला, हम अपने ढंग से जीते हैं। जो अपने शरीर को ज्यादा सजाता है, ज्यादा टीपटाप करता है, अभिनेताओं जैसी वेशभूषा पहनता है, वह असंयमी हो जाता है, अश्लील होने का रास्ता खोल लेता है।

✯ सीख :

अपना रहन-सहन, वेशभूषा सादगी से युक्त रखने चाहिए। अभिनेत्रियों था अभिनेताओं के चित्र या नाम छपे हुए वस्त्र कभी मत पहनो। इससे बुर संस्कारों से रक्षा होगी। विदेशियों की नकल से गुलामी के संस्कार पड़ते हैं। भारतीय पद्धति के कपड़े पहनना स्वास्थ्य व सरलता की दृष्टि से बहुत लाभदायी है।