गुरु-सन्देश~ धनभागी हैं वे जिनके जीवन में आत्मवेत्ता गुरुओं का ज्ञान अर्थात् वेदांत का ज्ञान है।
                                                                                                                                              -पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी

कोलकाता के एक प्रसिद्ध विद्यालय में दो विद्यार्थी सदा पहला-दूसरा स्थान लाते थे। पहले स्थानवाले का सदैव पहला और दूसरे स्थानवाले का सदैव दूसरा स्थान ही आता था । पिछले ५-६ साल से यही सिलसिला चल रहा था ।

एक बार पहला स्थान लानेवाले विद्यार्थी की माँ बीमार पड़ी । वह माँ की सेवा में लग गया एवं 2 महीने तक विद्यालय नहीं जा पाया । अंत में उसकी माँ का स्वर्गवास हो गया ।

अध्यापक सहित सभी विद्यार्थी सोचने लगे कि इस बार दूसरे स्थानवाला विद्यार्थी प्रथम आएगा।

पहले स्थानवाला विद्यार्थी सत्संगी था। उसने सुन रखा था कि “सुख-दुःख के प्रसंग आते-जाते रहते हैं। दुःख के दबाव से दब मरना यह कायरता है और दुःख के सिर पर पैर रखकर आगे बढ़ना यह बहादुरों का काम है।”

वह बालक सत्संग में जाता था, अतः सत्संग की बातों ने उसके दिल में बड़ी शक्ति दे दी । माँ मर गयी तो उसे दुःख हुआ परंतु उसने सोचा,”आँसू आँखों से बह रहे हैं एवं दुःख चित्त को हुआ है । मैं इसको देख रहा हूँ ।”

परीक्षा में केवल 5-7 दिन ही बाकी रह गए थे । उसने हिम्मत करके पढाई की और परीक्षा दे दी । जब परीक्षा फल आया तो विद्यार्थी और अध्यापक तो ठीक, लेकिन विद्यालय के प्रधानाचार्य भी दंग रह गये कि पहले स्थानवाला ही पहला आया !

पहले स्थानवाले को तो सत्संग मिला ही था, साथ ही दूसरे स्थानवाले को भी अपनी माँ के द्वारा सत्संग के कुछ रहस्य मिल चुके थे। 

दूसरे स्थान पाने वाले को अध्यापक अकेले में ले गये एवं कहा : “तुम दोनों की उत्तर पत्रिका हमने फिर से जाँची है । पहले स्थान वाले के तो उत्तर सही हैं ही लेकिन तुम चाहते तो पहला स्थान ला सकते थे । कुछ ऐसे सरल प्रश्न थे, जिनके तुमने उत्तर ही नहीं लिखे । इस बार तो तुम्हें प्रथम स्थान आने का मौका मिला था क्योंकि दो महीने तक उसकी माँ बीमार रही, फिर चल बसी । उसको सदमा लगा फिर भी वह पहला ही आया और तुम दूसरे, ऐसा क्यों ?”

विद्यार्थी :”मैंने जानबूझकर वे प्रश्न छोड़े थे ।”
अध्यापक :”जानबूझकर?”
विद्यार्थी :”हाँ, जो सदैव पहला आता था उसकी माँ इस बार बीमार हो गयी और वह माँ की सेवा में लगा रहा। यह उसकी सच्ची पढ़ाई थी । फिर उसकी माँ चल बसी तो उसके हृदय में सदमा लगा होगा । अगर इस बार मैं पहला स्थान पाता तो उसे दूसरा सदमा लग जाता । इसीलिए जानबूझकर मैंने कुछ उत्तर नहीं लिखे क्योंकि वह मेरा विद्यार्थी बंधु है।”

प्राचार्य एवं शिक्षकों की आँखों से स्नेह और धन्यवाद के आँसू बह निकले। प्राचार्य ने उस बालक को गले लगाते हुए कहा :”बेटा ! भले इस विद्यालय की पढाई में तेरा दूसरा स्थान आया किंतु मानवता, सज्जनता, परदुःखकातरता में तेरा पहला स्थान ही आया है ।”

~लोक कल्याण सेतु/अप्रैल २०१५

◆ सोचें, समझें और जवाब दें-

1- बहादुरों का कौन सा काम है ?
2- गुरु-सन्देश में धनभागी किसे कहा गया है ?

-Bodh Katha