AtmaGyan Hi Saar : Sant Gyaneshwar Short Story in Hindi

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➠ संत ज्ञानेश्वर महाराज का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ था । यह परम पावन पर्वकाल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का था । एक बार संत ज्ञानेश्वरजी, निवृत्तिनाथजी, सोपानदेवजी व मुक्ताबाई – ये चारों भाई-बहन नेवासा (महाराष्ट्र) पहुँचे । वहाँ उन्हें एक महिला अपने पति के शव के पास रोती हुई दिखाई दी ।

➠ करुणावश संत ज्ञानेश्वरजी द्वारा मृतक का नाम पूछे जाने पर महिला ने बताया : ‘‘सच्चिदानंद”

➠ नाम सुनते ही ज्ञानेश्वरजी बोल उठे : ‘‘अरे ! सत्-चित्-आनंद की तो कभी मृत्यु हो ही नहीं सकती।” फिर उन्होंने मृतदेह पर अपना हाथ फेरा और चमत्कार हो गया….

➠ वह मरा हुआ व्यक्ति जीवित हो उठा । वह व्यक्ति नवजीवन देनेवाले, सच्चिदानंदस्वरूप में जगे उन महापुरुष के शरणागत हो गया । यही सच्चिदानंद आगे चलकर ज्ञानेश्वरजी के गीताभाष्य के लेखक ‘सच्चिदानंद बाबा बने । कुछ समय बीतने पर चारों संत नेवासा से आलंदी की यात्रा पर निकले । चलते-चलते वे पुणताम्बे गाँव में पहुँचे, जहाँ गोदावरी के तट पर कालवंचना करते हुए चांगदेवजी महासमाधि लगाकर बैठे थे । 1400 वर्ष की तपस्या के बल से वे महायोगी तो बन गये थे परंतु गुरुज्ञान न होने के कारण अहंकार जोर मारता था । चांगदेवजी समाधि लगाते तो उनके चारों ओर मृत देहें रखी जाती थीं और आसपास मृतकों के सगे-संबंधी बैठे रहते थे । चांगदेवजी समाधि से उठते तो पूछते : “यहाँ कोई है क्या ?” तब आसमान से प्रेत-आत्माएँ ‘हम यहाँ हैं’ कहकर अपने-अपने शरीर में पुनः प्रवेश कर जातीं और वे मृत शरीर पुनः जीवित हो उठते थे ।

➠ इन संतों को जब इस बात का पता चला तो ‘मृतदेहों के सगे-संबंधियों को चांगदेवजी की समाधि टूटने की राह देखकर परेशान क्यों होना पड़े ?’ – ऐसा सोचकर मुक्ताबाई ने कहा :- “इन सभी मृत देहों को एकत्र करो, मैं इन्हें जीवित कर देती हूँ ।” ऐसा ही किया गया ।

➠ संत ज्ञानेश्वर जी से संजीवनी मंत्र लेकर मुक्ताबाई ने पास में पड़ी कुत्ते की लाश को सभी मृत देहों के ऊपर घुमाकर दूर फेंक दिया । उसी क्षण वह कुत्ता जीवित होकर भाग गया तथा सभी मृतक भी एक साथ जीवित हो उठे । सभी लोग संतों की अनायास बरसी कृपा का गुणगान करने लगे ।

➠ वहाँ से विदाई लेकर चारों भाई- बहन आगे की यात्रा पर निकल पड़े । इधर चांगदेवजी ने समाधि से उठते ही वही प्रश्न पूछा पर कोई जवाब नहीं मिला । शिष्यों से सारा वृत्तांत सुनते ही चांगदेवजी को तुरंत विचार आया कि ‘पैठण में भैंसे से वेद मंत्र बुलवाने वाले महान योगी बालक कहीं यही तो नहीं हैं !’

अतः दर्शन की उत्सुकतावश अंतर्दृष्टि से उन्होंने बालकों को आलंदी के रास्ते जाते देखा । पर पहले पत्र द्वारा सूचित करना आवश्यक समझकर वे पत्र लिखने बैठे परंतु विचलित हो गये कि यदि उनके नाम के आगे ‘चिरंजीव’ लिखूँ, तो वे मुझसे ज्यादा सामर्थ्यवान हैं अतः उनका अपमान होगा । यदि ‘तीर्थरूप’ आदि श्रेष्ठतासूचक विशेषण लिखूँ तो मैं 1400 वर्ष का और मैं ही स्वयं को छोटा दिखाकर उन्हें सम्मान दूँ, इससे मेरी इतने वर्षों की तपश्चर्या निरर्थक हो जायेगी ।

उनके अहंकार ने जोर पकड़ा, अंततः उन्होंने कोरा कागज ही अपने शिष्य के हाथों भेज दिया ।

➠ कोरा पत्र देख मुक्ताबाई ने कहा :- “चांगदेवजी ने यह कोरा कागज हमें भेजा है ! 1400 वर्ष तपस्या करके भी चांगदेव कोरे-के-कोरे ही रह गये ! लगता है इन योगिराज ने जिस तरह काल को फँसाया है, उसी तरह अहंकार ने इन्हें फँसाया है ।”

➠ निवृत्तिनाथजी बोले :- “सद्गुरु नहीं मिले इसीलिए इन्हें आत्मज्ञान नहीं हुआ और अहंकार भी नहीं गया । ज्ञानदेव ! आप इन्हें ऐसा पत्र लिखें कि इनके अंतःकरण में आत्मज्योत जग जाए और ‘मैं’ व ‘तू’ का भेद दूर हो जाए ।”

➠ संत ज्ञानेश्वरजी ने वैसा ही पत्र लिखा किंतु जैसे जल के बिना दरिया और दरिया बिन मोती नहीं हो सकता, ऐसे ही गुरुदेव के मुख से निःसृत ज्ञानगंगा के बिना सच्चा बोध और अनुभवरूपी मोती भी प्रकट नहीं हो सकता । वही योगी चांगदेव के साथ हुआ । अहंकारवश वे सोचने लगे कि ज्ञानदेवजी को वे अपने योग के ऐश्वर्य से प्रभावित कर देंगे । उन्होंने एक शेर पर दृष्टि डाली और संकल्प किया तो वह पालतू कुत्ते की तरह पूँछ हिलाते हुए उनके चरण सूँघने लगा । फिर चांगदेवजी ने एक भयंकर विषैले साँप पर अपने योगबल का प्रयोग किया और उसे चाबुक की तरह हाथ में धारण कर शेर पर सवार हो गये । अपने शिष्य-समुदाय को साथ लेकर वे ज्ञानेश्वरजी से मिलने आकाशमार्ग से निकल पड़े ।

➠ इधर चारों संत चबूतरे पर बैठे थे कि अचानक चांगदेवजी को इस प्रकार आते देख मुक्ताबाई ने कहा : ‘‘भैया ! इतने बड़े योगी हमसे इस तरह मिलने आ रहे हैं तो हमें भी उनसे मिलने क्या उसी प्रकार नहीं जाना चाहिए ?”

➠ ज्ञानेश्वरजी बोले : “ठीक है, तो हम इसी चबूतरे को ले चलते हैं ।”

और वे चबूतरे पर अपना हाथ घुमाते हुए बोले : “चल, हे अचल ! तू हमें ले चल । मैंने तुझे चैतन्यता दी है ।”

क्षणमात्र की देर किये बिना अचल चबूतरा चलने लगा ।

➠ जब चांगदेवजी ने देखा कि चारों संत सहज भाव से चबूतरे पर सवार होकर मेरी ओर आ रहे हैं और लेशमात्र अहंकार का किसी के चेहरे पर नहीं है तो उनका सारा अहंकार नष्ट हो गया ।
चांगदेव शेर से नीचे उतरे और दिव्यकांति ज्ञानदेवजी के चरणों से लिपट गये । चौदह सौ सालों से वहन किया गया भार उतारने से चांगदेवजी निर्भार हो गये ।

➠ सद्गुरु बिना की तपस्या से सिद्धियाँ तो मिल सकती हैं परंतु आत्मशांति, आत्मसंतुष्टि, आत्मज्ञान नहीं । ऐसी तपस्या से तो जीवत्व में उलझाने वाली सिद्धियों को पाने का अहंकार पुष्ट होता है और यह मनुष्य को वास्तविक शांति से दूर कर देता है । कितनी बार मौत को भी पीछे धकेलने वाले चांगदेवजी को 1400 साल की तपस्या करने के बाद यही अनुभव हुआ । यह अहंकार ब्रह्मज्ञानी संतों की शरण गये बिना, उनसे ब्रह्मज्ञान का सत्संग पाये बिना जाता नहीं है । आत्मा में जगे महापुरुषों की बिनशर्ती शरणागति स्वीकार करने पर अहंकार का विसर्जन तथा परम विश्रांति, परम ज्ञान की प्राप्ति वे महापुरुष हँसते-खेलते करवा देते हैं, जिसके आगे 1400 वर्ष की तपस्या से प्राप्त सिद्धियाँ भी कोई महत्त्व नहीं रखतीं । ऐसे ब्रह्मज्ञानी संत ज्ञानेश्वरजी ने आलंदी में विक्रम संवत् 1353 में मार्गशीर्ष कृष्ण त्रयोदशी के दिन जीवित समाधि ली ।

सीख : गुरु बिन भवनिधि तरई न कोई, चाहे बिरंचि शंकर सम होई ।

KarKasar Va Sadupyog: GandhiJi Short Story in Hindi

karkasar va sadupyog - gandhiji short story in hindi

सर्दी के मौसम में गाँधीजी सिर पर ऊन का एक टुकड़ा बाँधते थे । जब वह जर्जरीभूत हो गया, तब उनकी सेविका मनु ने उन्हें एक नया टुकड़ा दे दिया ।

गाँधीजी बोले : “न तो तुम कमाती हो, न मैं कमाता हूँ। तुम्हारे पिता की तरह मेरे पिता भी नहीं जो कमाकर मुझे भेजें । मैं तो गरीब आदमी हूँ । इस प्रकार पुराने कपड़े फेंक देना मेरे लिए संभव नहीं है। लाओ, वह पुराना कपड़ा मुझे दे दो। मैं उसमें पैवंद ( थिगली ) लगा दूँगा ।”

मनु जानती थी कि गाँधीजी जो बोलते हैं वह करके ही रहते हैं । वह कपड़ा ले आयी और गाँधीजी सुई-धागा लेकर उसमें पैवंद लगाने बैठ गये । पैवंद लगाते-लगाते जब रात के ग्यारह बजे तो मनु बोली : “लाइये,अब मैं लगा दूँ ।”

गाँधीजी : “तू देख तो सही ! मेरी परीक्षा तो कर कि मुझे यह काम करना आता है या नहीं ।”
गाँधीजी काम पूरा करके ही उठे । मनु ने देखा कि पैवंद ऐसे सुन्दर ढंग से लगाये हुए थे मानो किसी दर्जी का काम हो। टाँके भी एकदम सीधे लगे हुए थे ।

गाँधीजी में करकसर का गुण था । अपने पूज्य लीलाशाहजी बापू हों या अपने पूज्य बापूजी, प्रत्येक महान व्यक्ति में यह गुण होता है ।

➢ लोक कल्याण सेतु/सित.-अक्टू. 2006

RajKumar Ka Vivek: Satsishya Motivational Story in Hindi

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एक बार गुरु के दर पर आ गये तो फिर क्यों लौटना ? दृढ़ प्रीति का संदेश सुनाती हुई यह कहानी…..

एक युवराज घर छोड़कर भगवान के रास्ते गया और वृंदावन में जाकर रहने लगा । वहाँ उसने गुरु से दीक्षा ली और भजन करने लगा ।

राजा को जब इस बात का पता चला तो वह वृंदावन गया एवं गुरुजी के पास जाकर उसने कहा : “महाराज मेरा राजकुमार आपका शिष्य बना हुआ है, उसे समझा बुझाकर घर भेज दें । मैं आपके चरण पकड़ता हूँ ।”

लोगों को हुआ कि राजकुमार को वापस नहीं भेजेंगे तो राजा तो राजा होता है । वह अपने बल का भी उपयोग कर सकता है ।

राजकुमार उस वक्त आश्रम के कार्य से कहीं बाहर गया हुआ था। दूसरे गुरु भाई ने जाकर राजकुमार को बताया कि : “आपके पिताजी आपको लेने आये हैं एवं गुरुजी ने भी कहा है कि आप अपने पिता के साथ जायें, राजकाज संभालना एवं कभी-कभी इधर आते रहें ।”

राजकुमार बड़ा सयाना और चतुर था। उसने तवे की कालिख में तेल मिलाकर इसका काजल बना लिया और उस काजल से अपने मुँह को पोतकर काला कर दिया । फिर एक गधे पर बैठकर गुरुजी के पास पहुँचा ।

राजा देखकर चौंक उठा !!!
‘यह क्या राजकुमार गधे पर बैठकर आया है और उसने मुँह भी काला कर लिया है !’

राजा ने पूछा : “पुत्र! तुम्हारा मुँह किसने काला किया ?”

राजकुमार : “पिता जी किसी ने नहीं किया है। मैंने स्वयं ही अपने हाथों से मुँह काला कर लिया है । शास्त्रों में आता है कि जो ईश्वर के रास्ते, गुरु के रास्ते चले और फिर यदि उसे छोड़कर जाये तो उसे मुँह काला करके, गधे पर बैठकर अपने गाँव वापस जाना चाहिए इसलिए मैंने अपना मुँह काला कर लिया है और अब गधे पर बैठकर आपके साथ, आपके राज्य में चलूंगा ।”

पिता ने अपने ढंग से समझाया : “पहले अपना मुँह धो ले और घोड़े पर बैठकर राज्य में चल ।”

राजकुमार : “नहीं, यह शास्त्र का नियम है । जिसने एक बार गुरु और ईश्वर के रास्ते चलने के लिये कदम रख दिये तो उसे लौटना नहीं चाहिए । फिर भी वापस जाने की बात आये तो उसे काला मुँह करके गधे पर बैठकर जाना चाहिए ।”

राजा ने बहुत समझाया । गुरु ने भी कहा है : “बेटा शास्त्र की बात है तो सही लेकिन तेरे पिता तुझे लेने आये हैं । तू राजकुमार है अतः तू राजा बन सकता है ।”

राजकुमार : “राजा बनूंगा तो क्या हो जायेगा ? एक बार ईश्वर के मार्ग पर कदम रख दिये फिर वापस जाना….. यह तो नहीं हो सकेगा ।”

आखिर पिता तो पिता था, राजा भी था । समझदार तो था ही। उसे हुआ कि : “ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले पुत्र पर मैंने जबरदस्ती की । फिर भी पुत्र बड़ा विवेकी है ।”

राजा : “अच्छा, बेटा तू वापस मत आ । यहीं रह । मैं ही कभी-कभी आ जाया करूंगा। कभी तेरी माँ आ जायेगी । तू केवल हमें मिलने का कष्ट करना ।”

राजकुमार : “पिताजी आप यह आग्रह भी क्यों रखते हैं? मिलना ही हो तो अपनी आत्मा से मिलें ।  इस शरीर से क्या मिलना यह तो दृश्य है जबकि द्रष्टा तो आपका और मेरा दोनों का एक ही है ।”

राजकुमार का भी तीव्र विवेक-वैराग्य जाग उठा था । पिता वापस लौट गये । साधना करते-करते वह राजकुमार मुक्तात्मा हो गया, ब्रह्मज्ञानी हो गया ।

कैसी दिव्य समझ थी राजकुमार की ! एक बार गुरु के दर पर आ गये तो फिर क्यों लौटना ? मानों, उसने दृढ निश्चय कर रखा था कि :
आये हैं तेरे दर पर, तो कुछ करके उठेंगे…
नहीं तो मरके उठेंगे ।

उसकी दृढ़ता ने काम किया और वह अपने जीवन-ध्येय को पाने में सफल भी हो गया । धन्य हैं वे सतशिष्य और वे साधक !

➢ ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001

धन्य हैं भारत के विद्यार्थी | Chinese Hiuen Tsang & Nalanda Vishwavidyalaya

dhanya hain bharat ke vidyarthi

[Chinese Traveller  Hiuen Tsang & Nalanda Vishwavidyalaya]

➠ आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व पटना (बिहार) में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में चीन, जापान, कोरिया, सियाम, लंका, तुर्किस्तान व यूनान आदि देशों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए आते थे । प्रसिद्ध चीनी यात्री हुएन्सांग (Chinese Traveller Hiuen Tsang) लिखता है कि ‘ संसार में ऐसा एक भी देश नहीं है जो नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda Vishwavidyalaya) को न जानता हो अथवा ऐसी कोई जाति नहीं है कि जिसका एक भी विद्यार्थी नालंदा से शिक्षा लेकर महापंडित न बना हो ।‘ ईसा की सातवीं शताब्दी में इस विश्वविद्यालय में 10 हजार से अधिक विद्यार्थी पढ़ते थे ।

➠ नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda Vishwavidyalaya) में हुएन्सांग (Hiuen Tsang) चीन से आये थे । यहाँ विद्यार्थियों और अध्यापकों के मधुर व्यवहार से इन चीनी विद्वान को एक दिन भी ऐसा न लगा कि वह परदेश में हैं । हुएन्सांग (Hiuen Tsang) पढ़कर चीन लौटते समय बहुत-सी बुद्धमूर्तियाँ और बौद्धधर्म के ग्रंथों की हस्त-प्रतिलिपियाँ अपने साथ लेते गये । उन्हें विदा करने के लिए विश्वविद्यालय के अनेकों विद्यार्थी सिंधु नदी के मुहाने तक आ रहे थे  परंतु अकस्मात् ऐसा हुआ कि आधे रास्ते में ही जहाज तूफान में फँस गया और उसमें पानी भरने लगा तथा जहाज पानी में डूबने लगा । हुएन्सांग की सारी मेहनत पर पानी फिरनेवाला था ।

➠ उस समय नालंदा के विद्यार्थियों ने असाधारण, विश्वकल्याण की भावना और त्याग का परिचय दिया ।

➠ उन्होंने सोचा कि यदि ये मूर्तियाँ और अमूल्य धर्मग्रंथ नदी में डूब गए तो चीन में धर्म का प्रसार नहीं हो पायेगा । इसलिए अपना सर्वस्व त्यागकर उस स्मारक की रक्षा करने का उन्होंने संकल्प किया और नश्वर देह का मोह छोड़ अमर जीवन की प्राप्ति के लिए वे नदी के प्रवाह में कूद पड़े और देखते-देखते उनके पवित्र शरीर नदीतल में प्रविष्ट हो गए । अपनी देह सरिता को अर्पण करके उन्होंने जहाज के भार को हल्का किया और हुएन्सांग व धर्मग्रंथों की रक्षा हुई ।

➠ विद्यार्थियों का यह अपूर्व आत्मोत्सर्ग भारतीय संस्कृति और नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षण का ही प्रभाव था । इस प्रकार हमारे आर्य ब्रह्मचारी विद्यार्थियों के बलिदान से चीन देश में धर्म-ज्ञान का प्रचार-प्रसार हुआ ।

धन्य है भारतीय संस्कृति और धन्य हैं भारत के विद्यार्थी !

📚लोक कल्याण सेतु/दिस.२००२/अंक -66

Satya Ke Saman Dharm Nahi, Jhuth Ke Saman Paap Nahi: Gandhi Ji

satya saman dharm nahi, jhuth saman nahi paap

Mahatma Gandhi Ji : Sach Vs Jhuth. Satya Ahimsa Philosophy of GandhiJi, Truth Vs Lies:
 
‘सत्य के समान कोई तप नहीं है एवं झूठ के समान कोई पाप नहीं है ।’
 
जिसके हृदय में सच्चाई है, उसके हृदय में स्वयं परमात्मा निवास करते हैं ।
 
एक बार स्कूल में विद्यार्थियों के अंग्रेजी की परीक्षा के लिए कुछ अंग्रेज इन्स्पेक्टर आये हुए थे ।
 
उन्होंने कक्षा के समस्त विद्यार्थियों को एक-एक कर पाँच शब्द लिखवाये ।
 
कक्षा के अध्यापक ने एक बालक की कॉपी देखी जिसमें एक शब्द गलत लिखा था ।
 
अध्यापक ने उस बालक को अपना पैर छुआकर इशारा किया कि वह पास के लडके की कॉपी से अपना गलत शब्द ठीक कर ले ।
 
ऐसे ही उन्होंने दूसरे बालकों को भी इशारा करके समझा दिया और सबने अपने शब्द ठीक कर लिये, पर उस बालक ने कुछ न किया ।
 
इन्स्पेक्टरों के चले जाने पर अध्यापक ने डाँटा और कहा कि ‘इशारा करने पर भी अपना शब्द ठीक नहीं किया ? कितना मूर्ख है !’
 
बालक ने कहा : ‘‘अपने अज्ञान पर पर्दा डालकर दूसरे की नकल करना सच्चाई नहीं है ।”
 
अध्यापक : ‘‘तुमने सत्य का यह व्रत कब लिया और कैसे लिया ?”
 
‘‘राजा हरिश्चन्द्र के नाटक को देखकर, जिन्होंने सत्य की रक्षा के लिए अपनी पत्नी, पुत्र और स्वयं को बेचकर अपार कष्ट सहते हुए भी सत्य की रक्षा की थी ।”
 
मित्रगण बोले : ‘‘भाई ! नाटक तो नाटक होता है उसे जीवन में घटाना ठीक नहीं ।‘‘

बालक ने कहा : ‘‘पक्के इरादे से सब कुछ हो सकता है । मैंने उसी नाटक को देखकर जीवन में सत्य पर चलने का निश्चय किया है ।”

यह बालक कोई और नहीं बल्कि मोहनलाल करमचंद गाँधी ही थे ।

 सीख : सत्य के आचरण से अंतर्यामी ईश्वर प्रसन्न होते हैं, सत्यनिष्ठा दृढ होती है एवं हृदय में ईश्वरीय शक्ति प्रगट हो जाती है ।

सत्यनिष्ठ व्यक्ति के सामने फिर चाहें कैसी भी विपत्ति आ जाए, वह सत्य का त्याग नहीं करता । 

संकल्प : ‘हम भी अपने जीवन में सत्यव्रत और भगवन्नाम का आश्रय लेकर उस आत्मा के ज्ञान को पायेंगे और दूसरों को भी इसका लाभ दिलायेंगे ।
 

Maa Ne Mera Naam Lal Bahadur Kyu Rakha? Lal Bahadur Shastri Ji

Maa Ne Mera Naam Lal Bahadur Kyu Rakha Lal Bahadur Shastri Ji

प्रेरक-प्रसंग : लाल बहादुर ही क्यों ? (लाल बहादुर शास्त्री जयंती : २ अक्टूबर)

लाल बहादुर शास्त्री जी एक दिन सोचने लगे कि “परिवार में सभी लोगों का नाम प्रसाद व लाल पर है लेकिन माँ ने मेरा नाम लाल बहादुर क्यों रखा ?”

बालक माँ के पास गया और बोला : “माँ ! मेरा नाम लाल बहादुर क्यों रखा है, जबकि हमारे यहाँ तो किसी का नाम बहादुर पर नहीं है ? मुझे यह नाम अच्छा नहीं लगता ।”

पास ही बैठे उनके मामा ने कहा : “क्यों नहीं है, देखो इलाहाबाद के नामी वकील हैं तेज बहादुर ।”

तभी माँ रामदुलारी देवी हँसीं और बोलीं : “नन्हें का नाम ‘वकील बहादुर’ बनने के लिए तुम्हारे जीजा जी ने नहीं रखा है बल्कि उन्होंने ‘कलम बहादुर’ बनाने के लिए और मैंने अपने नन्हें को ‘करम बहादुर’ बनाने के लिए इसका नाम ‘लाल बहादुर’ रखा है । मेरा लाल ‘बहादुर’ बनेगा अपनी हिम्मत व साहस का… ।”

उन्होंने अपने ‘लाल बहादुर’ को गोद में बैठाकर अनेकानेक आशीष दे डाले ।

माता के आशीर्वाद फलीभूत हुए और इतिहास साक्षी है कि वे सहनशीलता, शालीनता, विनम्रता और हिम्मत में कितने बहादुर हुए । उनका धैर्य, साहस, संतोष तथा त्याग असीम था ।

Anything & Everything Is Possible : Har Manzil Paa Sakte Hai

hum har manzil paa sakte hain

Nothing is Impossible, Everything & Anything is Possible with a short story in Hindi of European Lady Atlanta:

स्वामी रामतीर्थ एक प्राचीन कथा सुनाया करते थे। यूनान में एक बहुत सुंदर लड़की रहती थी ‘अटलांटा’। उसका प्रण था कि ‘मैं उसी युवक से शादी करूँगी जो दौड़ में मुझे हरा देगा।’ अटलांटा दौड़ने में बहुत तेज थी , अतः अनेक इच्छुक युवक दौड़ में उसे हरा नहीं पाये। एक राजकुमार ने किसी देवता की आराधना की और उन्होंने उसे अटलांटा को हराने का उपाय बताया।

राजकुमार ने रात में दौड़ के रास्ते में सोने की ईंटें डलवा दीं। सवेरे जब दौड़ शुरु हुई तो अटलांटा पहले ही प्रयास में राजकुमार से बहुत आगे निकल गयी। दौड़ते समय रास्ते में अटलांटा को सोने की ईंट दिखाई दी। वह लोभ में फँस गयी, झट से झुकी और ईंट उठा ली तथा फिर दौड़ने लगी। इससे उसकी गति कुछ धीमी पड़ गयी। राजकुमार लगातार दौड़ता रहा। रास्ते में अनेक ईंटें मिलीं, अटलांटा किसी भी ईंट को छोड़ने को तैयार नहीं थी, वह ईंट उठा के पल्लू में बाँध लेती। वह इसी में अपना समय लगाती रही और राजकुमार उससे आगे निकल गया।

हम लोग भी उसी अटलांटा के पड़ोसी हैं जो लोभ, लालच और मोह की इसी प्रकार की ईंटों के चक्कर में फँस जाते हैं और अवसर निकल जाता है। जीतने की हर योग्यता रखने वाले हम जीवन की दौड़ में प्रायः हार जाते हैं। अगर हमें जीतना है तो इन प्रलोभनों से दूर रहना होगा। किसी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति के लोभ, मोह और लालच में न फँसें तो हम हर मंजिल पा सकते हैं। अपने मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य आत्मा-परमात्मा को पाकर संसाररूपी भवबंधन से, जन्म-मरण के चक्र से पार हो सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 23 अंक 303

RamJi Ki Chidiya : A Short Story of Vinoba Bhave in Hindi

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 रामजी की चिड़िया, रामजी का खेत । 
 खा ले मेरी चिड़िया, तू भर भर पेट ।। 
 -पूज्य संत श्री आशारामजी बापू 

एक समय आचार्य विनोबा भावे ने “भूदान यज्ञ” के लिए पदयात्रा शुरू की थी।

प्रात:काल के समय सूरज निकलने की तैयारी थी और पक्षियों का मीठा कलरव सुनायी दे रहा था ।

किसी खेत में ज्वार की फसल लहलहा रही थी और पक्षी मजे से ज्वार चुग रहे थे ।

मार्ग के इस दृश्य को देखकर विनोबा भावे के हृदय में हुआ : ‘किसान कितना आलसी है !’

पक्षी जुवार चुग रहे हैं और वह अभी तक रखवाली करने नहीं आया है !”

ऐसा सोचते हुए वे थोड़ा आगे बढ़े तो देखा कि किसान एक स्थान पर बैठे-बैठे गा रहा था :

” संत मिलन को जाइये तजि मोह माया अभिमान ।
ज्यों-ज्यों पग आगे धरे कोटि यज्ञ समान ।।”

किसान को ये पंक्तियाँ गाते देखकर विनोबा भावे ने सोचा कि “यह किसान तो साधु जैसा लगता है ।”

अतः उन्होंने पास जाकर कहा :”जय जय सीताराम”

किसान : “जय जय सीताराम बाबाजी !”

विनोबा भावे :”यह खेत तुम्हारा है ?”

किसान :”नहीं, यह खेत मेरा नहीं है ।”

यह खेत पहले दूसरे के नाम पर था, उसके पहले भी किसी दूसरे के नाम पर था, कुछ वर्षों के बाद किसी दूसरे के नाम पर होगा । यह खेत मेरा कैसे हो सकता है ?”

लोग कहते हैं “यह मेरा है.. वह मेरा है..” लेकिन आज तक किसी का कुछ भी नहीं रहा है । यह समझ उस किसान को थी ।

एक साधारण से दिखने वाले किसान का इतना ऊँचा ज्ञान देखकर विनोबा भावे ने पुनः कहा : “भैया ! यह खेत किसी का नहीं है, यह बात तो ठीक है लेकिन व्यवहार के अनुसार तो सुबह आकर खेत की रखवाली करनी चाहिए न !

तुम यहाँ बैठकर भजन गा रहे हो और पक्षी आकर मजे से दाने चुग रहे हैं । यदि पक्षी दाना चुग गये तो तुम्हारे लिए क्या बचेगा ?”

किसान : “पक्षी दाने चुग रहे हैं इसीलिए तो मैं यहाँ पर बैठा हूँ । वे बेचारे पूरी रात के भूखे होंगे । वे जुवार के दाने के भूखें हैं, उन्हें जुवार चुगने दो और मैं भक्ति का भूखा हूँ इसलिए मुझे भक्ति के गीत गाने दो । बाद में मैं उन्हें भगाऊँगा ।”

“क्या तुम रोज ऐसा ही करते हो ?”

“हाँ ! मैं रोज ऐसा ही करता हूँ और पक्षी भी ऐसा ही करते हैं ।”

“इस प्रकार रोज तुम्हारे कितने दाने कम हो जाते होंगे ?”

किसान :”ये सब हिसाब करने की मुझे जरूरत नहीं है । जो परमात्मा मुट्ठी भर जुवार में से मन भर जुवार पैदा कर सकता है, वही परमात्मा पक्षियों को भी चेतना देता है । पूरा हिसाब भी वही रखे ,मैं क्यों हिसाब रखूँ ?”

Balak Murlidhar Ko Maa se Mile Divya Sanskar : Story in Hindi

murlidhar ko maa se mile divya sanskar

A Short Story in Hindi For Kids [Baccho Ke lie Motivational Kahani]:

➠ बालक मुरलीधर की माँ ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थीं किंतु थीं बहुत बुद्धिमान। उन्होंने अपने बेटे को एक गुड़िया दी। उसकी खासियत थी कि वह जब भी गिरती थी, हर बार उठ खड़ी होती थी।

➠ वह खिलौना देते हुए माँ ने समझाया : ‘‘बेटा ! इस गुड़िया को गिराते-गिराते तुम थक जाओगे लेकिन यह हर बार उठ खड़ी होगी। इसी तरह जीवन में तुम्हें बार-बार गिरने पर भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए व फिर से उठ खड़ा होना चाहिए । हार नहीं मानना ही जिंदगी का दूसरा नाम है ।’’

➠ धन्य हैं भारत की नारियाँ ! जो एक छोटे खिलौने के माध्यम से भी ऐसे-ऐसे दिव्य संस्कार अपने सपूतों में डालती हैं । बचपन में मिले ये दिव्य संस्कार व्यक्ति को महान बना देते हैं । यही बालक मुरलीधर आगे चलकर प्रसिद्ध समाजसेवक बाबा आमटे के नाम से विख्यात हुआ ।

~ लोक कल्याण सेतु, अप्रैल 2011

Shri Ram Ke Guru Vashistha Ji MaharaJ Ki ‘दिव्य दृष्टि’

Vasishth ji ki Divya Drishti

Bhagwan Shri Ram Ke Guru Vashistha Ji MaharaJ Ki Divya Drishti : योगवाशिष्ठ महारामायण में वशिष्ठजी महाराज ने कहाः “हे रामजी! मूर्ख लोग क्या-क्या बकते हैं, मुझे सब पता है लेकिन हमारा उदार स्वभाव है। हम क्षमा करते हैं। हे रघुनन्दन! संतों के गुणदोष न विचारना लेकिन उनकी युक्ति लेकर संसारसागर से तर जाना।” -पूज्य संत श्री आशारामजी बापूजी

जब राम को वनवास जाने का मौका आया तब सीता भी उनके साथ चलने को तैयार हो गयीं। उस समय ऋषि बोलेः “सीते! तुम वन में मत जाना और यदि जाना ही है, तो अपने आभूषण पहनकर जाना।”

उस समय देवांग नाम के एक नागरिक ने कहाः “आप ऐसी राय क्यों देते हैं? आप तो वन में विचरण करने वाले ऋषि हैं। आपको गृहस्थ जीवन में इस प्रकार रुचि लेने की क्या आवश्यकता है?”

वशिष्ठजी ने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपना आग्रह जारी रखा। यह देखकर देवांग उनके विषय में अनाप-शनाप बकता रहा। 

यह बात सर्वविदित है कि सीता आभूषण पहनकर वन में गयीं। वहाँ संकेत देने के लिए और राम को संदेश देने के लिए सीता की अंगूठी, केयूर (भुजदण्ड), कुण्डल और अन्य आभूषण किस प्रकार काम आये यह देखकर वशिष्ठजी की दीर्घदृष्टि की वन्दना किये बिना नहीं रहा जाता। 

लेकिन कुप्रचार फैलाने वाले अभागों ने महर्षि वशिष्ठ की निन्दा करने में कोई कमी नहीं रखी। योगवाशिष्ठ महारामायण में वशिष्ठजी महाराज ने कहाः “हे रामजी! मूर्ख लोग क्या-क्या बकते हैं, मुझे सब पता है लेकिन हमारा उदार स्वभाव है। हम क्षमा करते हैं। हे रघुनन्दन! संतों के गुणदोष न विचारना लेकिन उनकी युक्ति लेकर संसार-सागर से तर जाना।”

संत का वन में रहना अच्छा है किन्तु विनोबाजी के कथनानुसारः “यदि सभी संत वन में बस जाएँ तो इस संसार की क्या हालत हो जाए ? संतों को स्वार्थी नहीं बनना चाहिए। उनको अपने ज्ञान और प्रकाश का लाभ संसार को देना ही चाहिए। इस काम में यदि उनको थोड़ा कष्ट सहना पड़े, संसार का हल्ला-दंगा सहना पड़े तो भी उनको उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए।”
संतजन संसार के झगड़ों का समाधान अपने तटस्थ भाव से कर सकते हैं। संसार के लोगों को संतों के वचन की अवगणना करना कठिन होगा। जो काम न्यायालय में फँसा हो, उसे संतजन एक पल में निपटा देते हैं। संत की शीतल वाणी संसारी लोगों के जले-गले हृदय पर विलक्षण प्रकार की शान्ति देती है। ऐसे संत इस नरकागार जैसे संसार में तीर्थधाम तुल्य है।

~हे प्रभु ! परम प्रकाश की ओर ले चल..