Dr. Ram Manohar Lohia: “Hamari Bhasha, Hamari Pehchan/ Sankriti”: Motivational Quote on Rashtriya Bhasha Hindi by Dr. Ram Manohar Ji.

एक युवक ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया था । इतिहास उसका प्रिय विषय था ।

एक बार वह युवक पाठ्यक्रम में निर्धारित अंग्रेज लेखक की लिखी इतिहास की पुस्तक पढ़ रहा था । जिसमें शिवाजी महाराज को एक लुटेरा सरदार कहा गया था । यह पढ़कर भारतीय सनातन धर्म को ही अपनी आन-बान-शान माननेवाले उस सच्चे देशप्रेमी का खून खौल उठा और उस बुद्धिमान, साहसी युवक ने उस कथन को चुनौती दी ।

पुस्तकालयों में जाकर खोज-खोजकर छत्रपति शिवाजी महाराज की महानता, वीरता, सच्चरित्रता, देशप्रेम और सर्वसुहृदता के तथ्य इकट्ठे कर सबके सामने रखे ।

अंततः अंग्रेजों को उस युवक की दृढ़ता के आगे घुटने टेकने पड़े और लोगों की आस्था, विश्वास को ठेस पहुँचानेवाला वह वाक्य पुस्तक से हटाना पड़ा ।
वे युवक थे राममनोहर लोहिया जी ।

उसके बाद लोहिया जी को अंग्रेजी भाषा से इतनी घृणा हो गयी कि उन्होंने किसी भी ब्रिटिश संस्था में प्रवेश लेने से इनकार कर दिया । इंग्लैंड ने भारत को अपना उपनिवेश बना रखा था इसलिए उन्होंने अपने अध्ययन के लिए बर्लिन (जर्मनी) विश्वविद्यालय को चुना ।

“हमारा देश, हमारी भाषा” यह मंत्र डॉ. लोहियाजी ने दिया था । उन्होंने क्षेत्रीय भाषाओं और हिन्दी भाषा का राष्ट्रीय भाषा या एक संयोजक के रूप में समर्थन किया । वे कहते थे : “हम प्रतीक्षा नहीं कर सकते कि जब हिन्दी विकसित होगी तो उसे राष्ट्रभाषा बनायेंगे । उसे हमारी राष्ट्रभाषा बनने दो । लगातार उपयोग में आने से वह स्वयं ही राष्ट्रभाषा के रूप में विकसित हो जायेगी ।”

लोहियाजी को हिन्दी भाषा से इतना प्रेम था कि वे निष्णात तो थे जर्मन और अंग्रेजी भाषा में किंतु अपने सारे निजी कार्य और बातचीत,यहाँ तक कि लोकसभा में भी वे हिन्दी का ही प्रयोग करते थे ।

सन् 1965 में लोहियाजी ने “अंग्रेजी हटाओ”आंदोलन शुरू कर दिया । उन्होंने “हिन्दी यहाँ और अब” नामक एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने अपना अनुभव और अंग्रेजी भाषा की सच्चाई के बारे में लिखा : “अंग्रेजी का
प्रयोग मौलिक अधिकारों में बाधा है और हीनभावना उत्पन्न करता है । पढ़े-लिखों और अनपढ़ जनता के बीच खाई उत्पन्न करता है ।”

आओ, हम सब एक होकर हिन्दी को उसके मूल कीर्ति-शिखर तक पहुँचायें ।

लोहियाजी भारत सरकार की अमीरों के लिए विशिष्ट प्रकार से चलायी जानेवाली दोहरी शिक्षा-नीति के विरुद्ध थे । उनका कहना था कि इस तरह एक नये प्रकार का वर्गभेद उत्पन्न होगा ।
आज भारत में अंग्रेजी भाषा को जो इतना महत्त्व और सम्मान दिया जा रहा है और हिन्दीभाषी व्यक्ति को अनपढ़-गँवार की संज्ञा देकर ठुकराया जा रहा है, इससे वर्षों पहले लोहियाजी का वर्गभेद का लगाया गया अनुमान सच होते दिख रहा है । वर्तमान में जो बच्चे अंग्रेजी विद्यालयों में पढ़ते हैं, वे खुद को उच्च वर्ग का मानते हैं, अहंकारी बनते हैं और तदनुसार व्यवहार भी करते हैं ।

आज यदि हम अपने स्वाभिमान, संस्कृति और गौरव की सुरक्षा करना चाहते हैं तो हम सबको एकजुट होकर लोहियाजी के “अंग्रेजी हटाओ” आंदोलन को फिर से शुरू करना होगा और ‘हमारा देश, हमारी भाषा’ का मंत्र जन-जन तक पहुँचाना होगा, तभी हम अपनी भाषा, अपनी पहचान को बचाने में सफल हो पायेंगे ।

➢ लोक कल्याण सेतु, फरवरी 2014