माता पिता, गुरु का पूजन करना यह हमारी संस्कृति है और युवक – युवती एक – दूसरे को स्पर्श करें, फूल दें यह विकृति है । विकृति से मानव का पतन होता है और संस्कृति से मानव सदाचारी होता है, संयत होता है, अपने बच्चों में अच्छे संस्कार पड़ते हैं ।

बच्चों पर माँ बाप ऐसे ही मेहरबान होते हैं लेकिन बच्चे जब माँ – बाप का आदर – पूजन करते हैं तो संस्कृति का मूल तत्व जो चैतन्य है वह बच्चों पर बरसता है और बच्चे नेक होते हैं ।

प्रशंसनीय, सुखी और सम्पन्न कौन रहता है ?

जो विकृत जीवन जीते हैं उनके माँ – बाप बुढ़ापे में नर्सिंग होम में, अनाथाश्रम में कराहते रहते हैं । जिसकी सेवा से माता पिता और सद्गुरु प्रसन्न होते हैं वह प्रशंसनीय, सुखी और सम्पन्न रहता है । 

मैंने तो यह देखा है, शास्त्र को तो अभी पढ़ा-सुना ।

माता – पिता और सद्गुरु प्रसन्न रहें तो हम भी प्रसन्न रहते हैं । हमारे द्वारा माता – पिता या सद्गुरु को दुःख होता है तो हम वह दुःख अपने लिए अनंत गुना बनाते हैं । हाँ, हम भगवान की तरफ जाते थे और माँ ने रोका तो हमने उनकी बात नहीं मानी । यह ठेस पहुंचाना नहीं है, यह तो ईश्वर की तरफ दृढता से जाना है ।

हम तो चाहते हैं सभी सुखी हों, सभी के बच्चे नेक हों, संस्कृति तो सभी की भलाई करती है । “सर्वतीर्थमयी माता, सर्वदेवमयः पिता’ यह शास्त्र-वचन है । जो बच्चे माता – पिता का सम्मान करते हैं, आगे चलकर वे संयमी बच्चे सम्मानित हो जाते हैं । मैं माता – पिता की चरणचम्पी करता था, गुरुदेव की आज्ञा में रहता था तो मुझे घाटा क्या हुआ ? मेरे पास कमी किस बात की रही ?

इस आँधी को हमें रोकना होगा….

तो १४ फरवरी को आपको भारतीय पद्धति से सच्चा, निर्विकार प्रेम – दिवस मनाना है और मनवाने में एक – दूसरे को साथ – सहकार देना है । आपके बच्चों को इस तरह से तैयार करो कि वे दूसरे बच्चों को भी तैयार करें भारत में यह जो वेलेंटाइन डे की आँधी आ रही है उसको हम वहीं रोक दें । हम चाहते हैं कि जिन्होंने यह आँधी चलायी है भगवान उनके बच्चों को भी उन्नत करें, उनका भी मंगल हो । वे भी बेचारे सम्मानित रहें,

विकारी – दुराचारी होकर क्यों भटकें ? 

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

 ‘सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और कोई दुःखी न हो।’

– लोक कल्याण सेतु / जनवरी 2018