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माता – पिता – गुरु की सेवा का महत्व

mata pita guru ki sewa ka mahatva

शास्त्रों में आता है कि जिसने माता – पिता तथा गुरू का आदर कर लिया, उसके द्वारा संपूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया उसके संपूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो गये । वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने माता – पिता और गुरू की सेवा के महत्व को समझा तथा उनकी सेवा में अपना जीवन सफल किया । ऐसा ही एक भाग्यशाली सपूत था – पुण्डलिक ।

पुण्डलिक अपनी युवावस्था में तीर्थयात्रा करने के लिए निकला । यात्रा करते – करते काशी पहुँचा । काशी में भगवान विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद उसने लोगों से पूछा : क्या यहाँ कोई पहुँचे हुए महात्मा हैं, जिनके दर्शन करने से हृदय को शांति मिले और ज्ञान प्राप्त हो ?

लोगों ने कहा : हाँ हैं । गंगा पार कुक्कुर मुनि का आश्रम है । वे पहुँचे हुए आत्मज्ञानी संत हैं । वे सदा परोपकार में लगे रहते हैं । वे इतनी उँची कमाई के धनी हैं कि साक्षात माँ गंगा, माँ यमुना और माँ सरस्वती उनके आश्रम में रसोईघर की सेवा के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं ।

पुण्डलिक के मन में कुक्कुर मुनि से मिलने की जिज्ञासा तीव्र हो उठी । पता पूछते – पूछते वह पहुँच गया कुक्कुर मुनि के आश्रम में । मुनि के देखकर पुण्डलिक ने मन ही मन प्रणाम किया और सत्संग वचन सुने । इसके पश्चात पुण्डलिक मौका पाकर एकांत में मुनि से मिलने गया । मुनि ने पूछा : वत्स ! तुम कहाँ से आ रहे हो ?

पुण्डलिक : मैं पंढरपुर (महाराष्ट्र) से आया हूँ ।

तुम्हारे माता – पिता जीवित हैं ?

हाँ हैं ।

तुम्हारे गुरू हैं ?

हाँ, हमारे गुरू ब्रह्मज्ञानी हैं ।

कुक्कुर मुनि रूष्ट होकर बोले : पुण्डलिक ! तू बड़ा मूर्ख है । माता – पिता विद्यमान हैं, ब्रह्मज्ञानी गुरू हैं फिर भी तीर्थ करने के लिए भटक रहा है ? अरे पुण्डलिक ! मैंने जो कथा सुनी थी उससे तो मेरा जीवन बदल गया । मैं तुझे वही कथा सुनाता हूँ । तू ध्यान से सुन ।

एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा ?

निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास । शिव – पार्वती ने कहा : जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा ।

कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने । गणपति जी चुपके से एकांत में चले गये । थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया । जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं । अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा ।

फिर गणपति जी आये शिव – पार्वती के पास । माता – पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र – पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे । एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता – पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली ।

शिव – पार्वती ने पूछाः वत्स ! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की ?

गणपति जी : सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमयो पिता… सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है । पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है । पिता देवस्वरूप हैं। अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं । तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये ।

शिव-पुराण में आता है :-

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः ।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम् ।।

अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत ।

तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा ।।

पुत्रस्य य महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम् ।

अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः ।।

इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम् ।

पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम् ।।

जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है । जो माता – पिता को घर पर छोड़ कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता – पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है क्योंकि पुत्र के लिए माता – पिता के चरण – सरोज ही महान तीर्थ हैं । अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं परंतु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है । पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुंदर तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं ।

(शिव पुराण, रूद्र सं.. कु खं.. – 20)

पुण्डलिक मैंने यह कथा सुनी और अपने माता – पिता की आज्ञा का पालन किया । यदि मेरे माता-पिता में कभी कोई कमी दिखती थी तो मैं उस कमी को अपने जीवन में नहीं लाता था और अपनी श्रद्धा को भी कम नहीं होने देता था । मेरे माता – पिता प्रसन्न हुए । उनका आशीर्वाद मुझ पर बरसा । फिर मुझ पर मेरे गुरूदेव की कृपा बरसी इसीलिए मेरी ब्रह्मज्ञान में स्थिति हुई और मुझे योग में भी सफलता मिली । माता – पिता की सेवा के कारण मेरा हृदय भक्तिभाव से भरा है । मुझे किसी अन्य इष्टदेव की भक्ति करने की कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी ।

मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदवो भव ।

मंदिर में तो पत्थर की मूर्ति में भगवान की कामना की जाती है जबकि माता – पिता तथा गुरूदेव में तो सचमुच परमात्मदेव हैं, ऐसा मानकर मैंने उनकी प्रसन्नता प्राप्त की । फिर तो मुझे न वर्षों तक तप करना पड़ा, न ही अन्य विधि – विधानों की कोई मेहनत करनी पड़ी । तुझे भी पता है कि यहाँ के रसोईघर में स्वयं गंगा-यमुना-सरस्वती आती हैं । तीर्थ भी ब्रह्मज्ञानी के द्वार पर पावन होने के लिए आते हैं । ऐसा ब्रह्मज्ञान माता – पिता की सेवा और ब्रह्मज्ञानी गुरू की कृपा से मुझे मिला है ।

पुण्डलिक तेरे माता – पिता जीवित हैं और तू तीर्थों में भटक रहा है ?

पुण्डलिक को अपनी गलती का एहसास हुआ । उसने कुक्कुर मुनि को प्रणाम किया और पंढरपुर आकर माता – पिता की सेवा में लग गया ।

माता – पिता की सेवा ही उसने प्रभु की सेवा मान ली । माता – पिता के प्रति उसकी सेवानिष्ठा देखकर भगवान नारायण बड़े प्रसन्न हुए और स्वयं उसके समक्ष प्रकट हुए । पुण्डलिक उस समय माता – पिता की सेवा में व्यस्त था । उसने भगवान को बैठने के लिए एक ईंट दी ।

अभी भी पंढरपुर में पुण्डलिक की दी हुई ईंट पर भगवान विष्णु खड़े हैं और पुण्डलिक की मातृ – पितृभक्ति की खबर दे रहा है पंढरपुर तीर्थ ।

यह भी देखा गया है कि जिन्होंने अपने माता-पिता तथा ब्रह्मज्ञानी गुरू को रिझा लिया है, वे भगवान के तुल्य पूजे जाते हैं । उनको रिझाने के लिए पूरी दुनिया लालायित रहती है। वे मातृ – पितृभक्ति से और गुरूभक्ति से इतने महान हो जाते हैं ।

– मातृ पितृ पूजन साहित्य से…

हे देवियों ! आप कैसी माँ बनना चाहेंगी ?

he devion aap kaisi maa banna chahengi

एक सत्संगी माँ अपने बालक को सीख देती कि “बेटा ! कभी किसी को ना सताना । किसी के प्रति मन में भेदभाव ना रखना । निर्धनों की सहायता करना। सबको अपना मान के सबसे स्नेह करना । भगवान तुमसे बड़े प्रसन्न रहेंगे ।”

उस बालक ने माँ की सीख गांठ बांध ली । एक दिन घर की नौकरानी का बालक भी उस बच्चे के पास खड़ा था तो माँ ने उसे दो मिठाइयां देकर कहा : “एक इस बालक को देना दूसरी तुम खा लेना ।”

माँ ने उसे जो दूसरी मिठाई दी, वह पहले वाली से बड़ी थी । पर माँ के उस सपूत ने दूसरी वाली अपनी बड़ी मिठाई नौकरानी के बालक को दे दी और स्वयं छोटी वाली खाई । माँ ने यह देखा तो पूछा : “तुमने बड़ा टुकड़ा, जो तुम्हें खाने को दिया था, उसे क्यों दे दिया ?”

बालक : ‘माँ आप ही तो कहती हैं सब हमारे हैं, निर्धन बच्चों को भी अपने भाई- बंधु समझना, सबसे स्नेह करना।’ तब यदि मैंने अपनी मिठाई उसे दे दी और उसकी वाली स्वयं खाली तो इसमें हानि क्या है ?”

बालक की बात से गदगद हो माँ ने उसे हृदय से लगा लिया, बोली : “मेरे लाल ! तुमने अच्छा ही किया । सदैव इसी प्रकार सभी से स्नेह करना, सबको अपना समझना । सब के रूप में एक ईश्वर ही तो है ! तुम अवश्य महान होओगे और सभी लोग तुम्हें प्यार- आदर देंगे । सज्जन आशीर्वाद देंगे । परमात्मा प्रसन्न होंगे ।”

आगे चलकर यह एक देशभक्त एवं महान विद्वान न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे के नाम से सुप्रसिद्ध हुए, जो लोगों के बड़े स्नेह व आदर के पात्र थे । 

दूसरा और यह प्रसंग भी आपने पढ़ा- सुना होगा : एक माँ का बेटा विद्यालय जाता और किसी की कलम चुरा लाता, तो किसी का कुछ सामान । चोरी करने की बात पता चलने पर भी माँ बालक को रोकती- टोकती नहीं थी, बल्कि कहती : “बेटा ! तू तो बड़ा चालाक है ।’ 

माँ की ऐसी कुशिक्षाओं से बालक का स्वभाव बिगड़ता गया । वह बड़ा होकर बड़ी – बड़ी चोरियां करने लगा, लूटपाट, मारकाट, हत्याएं भी करने लगा । समय पाकर वह राज्य का सबसे कुख्यात डाकू बना । आखिर वह एक दिन पकड़ा गया और उसे फांसी की सजा सुनाई गई ।

जब उससे अंतिम इच्छा पूछी गई तो उसने कहा : ‘मेरी माँ को बुलाओ ।’ वैसा किया गया । डाकू के हाथ बंधे थे । माँ को देखते ही उसने कहा : ‘माँ ! मैं तेरे कान में कुछ कहना चाहता हूं, मेरे नजदीक आ ।’

माँ उसके करीब गई तो उसने माँ का कान ऐसा काटा की कटा हुआ टुकड़ा उसके मुंह में आ गया । उसने उसे थूक दिया । माँ चिल्लाई ।

डाकू से ऐसा करने का कारण पूछा गया तो वह माँ को बोला : माँ ! तेरी वजह से ही आज मैं फांसी पर लटकने जा रहा हूं । यदि तूने मुझे बचपन में ही चोरी करने पर शाबाशी देकर लाड लड़ाने के बजाय सही सीख दी होती और जरूरत पड़ने पर दो थप्पड़ भी लगा दिए होते तो मेरे यह हाल ना होते और आज मैं एक सज्जन व्यक्ति होता ।” कुशिक्षा देने वाली उस माँ का कान ही नहीं बल्कि समाज में नाक भी कट गई ।

न्यायमूर्ति रानाडे की माँ को धन्यवाद उस क्षण भी फलित हुआ और आज भी हो रहा है और आगे भी होता रहेगा । जब- जब कोई पाठक यह प्रसंग पढ़ेगा और उस लुटेरे की माँ की नाक उस दिन भी कटी और आज भी आपके – हमारे सामने कट रही है और आगे भी कटती रहेगी जब- जब कोई यह पढ़ेगा ।

हे देवियों ! आप कैसी माँ बनना चाहेंगी ? आप अपना बेटा कैसा देखना चाहेंगी ? देश को कैसा व्यक्तित्व देंगी– एक महापुरुष अथवा कोई डाकू- लुटेरा … ?

वस्तु या व्यक्ति एक-के-एक परंतु महत्व इसका है कि उसे संग और संस्कार कैसे मिलते हैं ।

धूल पानी का संग पाकर कीचड़ हो जाती है, पैरों तले रौंदी जाती है, दूसरों को गंदा कर देती है और दलदल में फंसा के विनष्ट कर देती है और वही धूल संतों के चरणों को छू जाती है तो उसे अपने सिर पर धारण करने के लिए भगवान भी लालायित होकर संतों के पीछे- पीछे जाते हैं ।

भगवान उद्धव जी से कहते हैं :

मैं संतन के पीछे जाऊं, जहाँ जहाँ संत सिधारे ।

चरणन रज निज अंग लगाऊँ, शोधूँ गात हमारे ।।

उधो ! मोहे संत सदा अति प्यारे ।

उधो ! मोहे संत सदा अति प्यारे ।…

– ऋषि प्रसाद, जनवरी 2019

संस्कृति तो भलाई करती है और विकृति पतन ! [ 14 February 2021: Valentine Day vs Parent Worship Day ]

valentines day vs parents worship day

माता पिता, गुरु का पूजन करना यह हमारी संस्कृति है और युवक – युवती एक – दूसरे को स्पर्श करें, फूल दें यह विकृति है । विकृति से मानव का पतन होता है और संस्कृति से मानव सदाचारी होता है, संयत होता है, अपने बच्चों में अच्छे संस्कार पड़ते हैं ।

बच्चों पर माँ बाप ऐसे ही मेहरबान होते हैं लेकिन बच्चे जब माँ – बाप का आदर – पूजन करते हैं तो संस्कृति का मूल तत्व जो चैतन्य है वह बच्चों पर बरसता है और बच्चे नेक होते हैं ।

प्रशंसनीय, सुखी और सम्पन्न कौन रहता है ?

जो विकृत जीवन जीते हैं उनके माँ – बाप बुढ़ापे में नर्सिंग होम में, अनाथाश्रम में कराहते रहते हैं । जिसकी सेवा से माता पिता और सद्गुरु प्रसन्न होते हैं वह प्रशंसनीय, सुखी और सम्पन्न रहता है । 

मैंने तो यह देखा है, शास्त्र को तो अभी पढ़ा-सुना ।

माता – पिता और सद्गुरु प्रसन्न रहें तो हम भी प्रसन्न रहते हैं । हमारे द्वारा माता – पिता या सद्गुरु को दुःख होता है तो हम वह दुःख अपने लिए अनंत गुना बनाते हैं । हाँ, हम भगवान की तरफ जाते थे और माँ ने रोका तो हमने उनकी बात नहीं मानी । यह ठेस पहुंचाना नहीं है, यह तो ईश्वर की तरफ दृढता से जाना है ।

हम तो चाहते हैं सभी सुखी हों, सभी के बच्चे नेक हों, संस्कृति तो सभी की भलाई करती है । “सर्वतीर्थमयी माता, सर्वदेवमयः पिता’ यह शास्त्र-वचन है । जो बच्चे माता – पिता का सम्मान करते हैं, आगे चलकर वे संयमी बच्चे सम्मानित हो जाते हैं । मैं माता – पिता की चरणचम्पी करता था, गुरुदेव की आज्ञा में रहता था तो मुझे घाटा क्या हुआ ? मेरे पास कमी किस बात की रही ?

इस आँधी को हमें रोकना होगा….

तो १४ फरवरी को आपको भारतीय पद्धति से सच्चा, निर्विकार प्रेम – दिवस मनाना है और मनवाने में एक – दूसरे को साथ – सहकार देना है । आपके बच्चों को इस तरह से तैयार करो कि वे दूसरे बच्चों को भी तैयार करें भारत में यह जो वेलेंटाइन डे की आँधी आ रही है उसको हम वहीं रोक दें । हम चाहते हैं कि जिन्होंने यह आँधी चलायी है भगवान उनके बच्चों को भी उन्नत करें, उनका भी मंगल हो । वे भी बेचारे सम्मानित रहें,

विकारी – दुराचारी होकर क्यों भटकें ? 

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् ॥

 ‘सभी सुखी हों, सभी निरोगी रहें, सभी सबका मंगल देखें और कोई दुःखी न हो।’

– लोक कल्याण सेतु / जनवरी 2018

सभी देशवासियों विश्ववासियों का मंगल हो । [Pujya Bapuji Message on Parents Worship Day]

sabhi desh vasiyon ka mangal ho

‘वेलेंटाइन डे’ के दिन लड़के – लड़कियाँ एक दूसरे को फूल देकर ‘आई लव यू’ बोलते हैं । 28 विकसित देशों में हर साल 13 से 19 साल तक की 12,50,000 लड़कियाँ गर्भवती हो जाती हैं । उनमें से लगभग 5 लाख तो गर्भपात कराती हैं और 7,50,000 बच्चियाँ माँ बन के या तो सरकारी नर्सिंग होम, सरकार एवं माँ-बाप पर बोझ बन जाती हैं या तो फिर वेश्या का धंधा आदि करती हैं । तो यह गंदगी अब हमारे देश में आ गयी है । ‘वेलेंटाइन डे’ पर 5 महानगरों में सैकड़ों करोड़ की दारू बिकी जिसे निर्दोष बच्चे – बच्चियों ने पिया । सैकड़ों लड़के – लड़कियाँ भाग जाते हैं 14 फरवरी को ।

यदि लड़का दारू पीकर पड़ा रहे तो उसकी माँ कितनी दुःखी होगी ! स्कूल में जाने वाली लड़की दारू पिये तो उस लड़की से उसकी माँ क्या उम्मीद कर सकती है और क्या उम्मीद कर सकता है वह जो उससे विवाह करेगा ? यह बड़ा गम्भीर विषय है ! तो मेरा हृदय पीड़ित हो गया । इसीलिए मैंने भगवान को प्रार्थना की और भगवान ने मुझे प्रेरित कर दिया ।

मैंने 14 फरवरी को ‘वेलेंटाइन डे’ की जगह ‘मातृ – पितृ पूजन दिवस’ मनाने का आह्वान किया । बच्चे-बच्चियाँ ‘प्रेम दिवस’ मनायें लेकिन अपने माँ – बाप को प्रेम करें । माँ – बाप ऐसे ही मेहरबान होते हैं लेकिन उन मेहरबान माता – पिता को जब आप तिलक करोगे, बेटा पिता को तिलक करे व चरण धोये और बेटी माता को तिलक करे व चरण धोये, दोनों को हार पहनायें और उनकी प्रदक्षिणा करें तो माँ – बाप तो मेहरबान होंगे लेकिन माँ – बाप का जो अंतरात्मा है वह भी बरस जायेगा और मेरे बच्चे-बच्चियों की जिंदगी सँवर जायेगी । मैंने फिर ‘मातृ – पितृ पूजन दिवस’ शुरू किया । गणपतिजी का पूजन करो, भगवान सद्बुद्धि देंगे; माँ – बाप की भी जिंदगी सँवरेगी और बच्चे – बच्चियों की भी जिंदगी सँवरेगी ।

‘वेलेंटाइन डे’ की जगह पर ‘मातृ – पितृ पूजन दिवस’ मनाओ, मैं यही भिक्षा माँगता हूँ आप लोगों से बस ! करोड़ों माताओं व पिताओं के दिल की दुआ ले लो । हजारों – लाखों बच्चों की नष्ट होती जिंदगी को बचा लो, बस । मुझे आपका रुपया – पैसा कुछ नहीं चाहिए । आप मेरी ‘जय’ बोलो तो मुझे अच्छा नहीं लगता । फूल की पंखुड़ी भी आपकी मुझे नहीं चाहिए लेकिन आपका स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन हो, यह मैं चाहता हूँ । मैं यह नहीं चाहता कि मेरे को कोई यश दो, भले सभी सरकारों को यश जाय लेकिन बच्चों की जिंदगी तबाही से बचे और उनके माँ – बाप बुढ़ापे में कराहने से बचें । जो छोरे अपने को नहीं सँभाल पाते हैं वे बूढे माँ – बाप की क्या सेवा करेंगे ! विदेशों की तरह नर्सिंग होम में रख देंगे । हमारे यहाँ भी माँ – बाप के लिए वृद्धाश्रमों की जरूरत पड़ रही है, शर्म की बात है ! नहीं… नहीं… बच्चों की देखभाल माँ – बाप करें और माँ – बाप की देखभाल बच्चे करें, यह हमारी भारतीय संस्कृति है ।

चाहे ईसाई के बच्चे हों, वे भी उन्नत हों और ईसाई, मुसलमान, पारसी, यहूदी… सभी के माता – पिता संतुष्ट रहें । किसके माता-पिता चाहेंगे कि हमारे बेटे – बेटियाँ विद्यार्थीकाल में एक-दूसरे को फूल दें, ‘आई लव यू, लव यू…’ करके कुकर्म करें और यादशक्ति गँवा दें ! किसी के भी माँ – बाप ऐसा नहीं चाहेंगे । इसीलिए मैंने यह अभियान शुरू किया है और यह अभियान जिनको अच्छा नहीं लगता है वे कुछ-का-कुछ करवाकर मेरे को बदनाम करना चाहते हैं । यह मेरी बदनामी नहीं है, मानवता की बदनामी है भैया ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ, मेरी बदनामी आप खूब करो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है । बस, एक मानवता के उत्थान में आप अड़चन मत बनो । आप तो सहभागी हो जाओ । 

सभी धर्मों को लाभान्वित कर रहा है मातृ-पितृ पूजन दिवस …

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः ।

भारत ‘हिन्दू भवन्तु सुखिनः नहीं कहता है, ‘सर्वे कहता है । ‘सर्वे’ में ईसाई, पारसी सब आ गये ।  अभी मैं ‘मातृ – पितृ पूजन दिवस’ के लिए सिर्फ हिन्दुओं को नहीं आवाहन करता हूँ कि ‘हिन्दू बच्चे मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाओ’ – ऐसा नहीं सभी मनाओ ।

कोई ईसाई नहीं चाहता कि मेरी कन्या विद्यालय जाते – जाते गर्भवती हो जाय । कोई मुसलमान या यहूदी, पारसी भी नहीं चाहता है तो हिन्दू कैसे चाहेगा कि मेरी कन्या विद्यालय में जाय और हवस की शिकार बन जाय । तो सभी मुसलमानों का, सभी ईसाइयों, यहूदियों, पारसियों तथा हिन्दुओं का भविष्य मंगलमय हो और उनके बच्चों का जीवन मंगलमय हो इसीलिए मैंने मातृ पितृ पूजन दिवस अभियान छेड़ा है ।

ईसाई अपने माँ – बाप का पूजन करो , मुसलमान अपने अम्मा – अब्बाजान का पूजन सत्कार करो लेकिन ‘आई लव यू’, ‘तू नहीं तो और सही’ – यह लोफरों का रास्ता छोड़ो, नेक इन्सान बनो । आपके अब्बा – दादा ऐसे थे क्या ?

बुद्ध ने ‘वेलेंटाइन डे’ मनाया होता तो ‘भगवान बुद्ध नहीं होते । हमने ऐसा किया होता तो हम ‘आशाराम बापू’ नहीं बनते । नरेन्द्रजी ने ऐसा किया होता तो ‘स्वामी विवेकानंद’ नहीं बनते ।

अतः मैं तो चाहूँगा कि भारत के युवक – युवतियाँ तो माँ – बाप का आदर-पूजन करें लेकिन जो बेचारे विदेशी भटक गये हैं वे भी अपने माता – पिता का आदर करें । हम पड़ोस की बहन फूल देकर बुरी नजर से देखें, पड़ोस की बहन हमको बुरी नजर से देखें –

काहें को ऐसा करना पड़ोस की बहन का भला हो, पड़ोस के भाइयों का भला हो । माता – पिता का मंगल हो, बच्चे – बच्चियों का मंगल हो ! ईसाई भी सुखी रहें, मुसलमान भी सुखी रहें, पारसी व यहूदी भी सुखी रहें । सभी देशवासियों का, विश्ववासियों का, सभी का मंगल हो ! प्राणिमात्र सुखी रहें ।

– ऋषि प्रसाद / फरवरी 2014

वे तुम्हें ऊँचा उठाना चाहते हैं….

ve tumhein uncha uthana chahte hain

-पूज्य बापूजी

एक ब्राह्मण का पुत्र था,  काशी पढ़ने गया । पढ़ के लौट रहा था तो वहाँ के लोगों ने सम्मान किया कि ‘गुरुकुल में पहला नम्बर आया है, बड़ा विद्वान है । आदर – सत्कार से लोगों ने विदाई दी । वह अपने गाँव आया । शास्त्री पढ़ा था तो जरा विद्वत्ता का अभिमान अंदर था । पिता को पता चला कि बेटा आ गया है तो ज्यों ही वह घर में प्रवेश करने लगा त्यों ही वे जानबूझ के उसकी माँ के साथ बात करने लगे । “तेरा लड़का आज आयेगा लेकिन मैंने जैसा चाहा वैसा तो नहीं बना, शास्त्री की पदवी ले के आयेगा । मैंने जाँच करवायी है, ऐसी कोई खास तरक्की नहीं की ।”

लड़का सुन रहा है । वह जो अभिमान से भरा हुआ था, ठुस्स हो गया ।

फिर पिता बोले : “शास्त्री पढ़ा तो क्या पढ़ा ! मैं तो उम्मीद रखता था कि कहाँ-का-कहाँ पहुँचेगा !” लड़के को लगा कि ‘मैं तो पढ़ाई निपटा के आया हूँ लेकिन अभी बाकी है । एकाध दिन रहा घर में । फिर आज्ञा ले के गया पढने और आचार्य हो गया । शास्त्रों के उदाहरण, बढ़िया बढ़िया श्लोक, तत्वज्ञान के श्लोक कंठस्थ कर लिये और घर आया ।

पिता फिर से बोले कि “मैं समझा था कि विद्वान होगा, आत्मरामी होगा लेकिन यह तो पंडित हुआ, खाली सिर खपाऊ। खाली विद्वान होने की भ्रान्ति ले आया अपनी खोपड़ी में, और क्या किया ! १७ साल हमारे व्यर्थ गये । इससे तो नहीं पढ़ता तो अच्छा था।”

लड़के को हुआ कि ‘कई विषयों में आचार्य (आचार्य – एम.ए.) तक पढ़ा, वहाँ काशी में सर्वप्रथम आया हूँ और मेरे पिता तो कुछ भी गौर नहीं कर रहे हैं ।

पिता ने कहा : “जिसको उपनिषदों आत्मा – अनात्मा का, जीव – ब्रह्म की एकता का ज्ञान नहीं वह तो अज्ञान में ही पड़ा है, प्रकृति में ही पड़ा है और प्रकृति तो जड़ है । उसी का खोपड़ी में विस्तार किया और क्या किया !

लड़का फिर गया । लेकिन गया तो विद्वानों के पास । और जड़-चेतन का, प्रकृति-पुरुष का, जीव-ब्रह्म का विवेक – ये सब न्यायशास्त्र, तर्कशास्त्र…. आकाश का गुण है शब्द, शब्दगुणकं आकाश ।… वायु दो तरह की होती है नित्योऽनित्यश्च नित्यः परमाणुरूपः अनित्यः कार्यरूपः ।… 

इस प्रकार की जो कुछ प्रक्रियाएं थीं, सिद्धांत थे वे सब खोपड़ी में भर के आया । ज्यों घर में प्रवेश कर रहा था त्यों ही उसकी माँ के आगे पिता ने उसकी निंदा करना चालू कर दिया । “बार-बार गया लेकिन वही गधे-का-गधा हो के लौटा ।” इसको लगा कि ‘मैं इतने लोगों को शास्त्रार्थ में परास्त करके आया हूँ और मेरे को कहते हैं ‘गधा’ ! ये कोई बाप हैं ?? ऐसे बाप का तो गला दबाना चाहिए, पैर क्या छूना !

पुत्र के मन में पिता के प्रति कुविचार आ गया । उसकी माँ पिता को कहती है कि “जब वह आने को होता है और जब भी वह आपके आगे अपनी विद्या की बात करता है तब आप उसको तुच्छ साबित करते हो, डाँटते – फटकारते हो । फिर वह मेरे आगे रो के, निराश हो के जाता है ।”

पिता कुछ बोले नहीं क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि लड़का सुन रहा है । लड़का माँ के पास रो के फिर कहीं गाँव में इधर – उधर गया ।

कुछ देर बाद माँ ने वही बात दोहरायी । लेकिन अब पिता को पता नहीं था कि बेटा गाँव में से घूम के आया है और बाजू वाले कमरे में बैठा हैं । अपने बारे में चर्चा शुरू होती देख बेटा दरवाजे के पीछे छुप के सुनने लगा ।

पिता ने कहा : “तू नादान है । तू उसको क्या जानती है ! मैं जानता हूँ, ऐसा लड़का तो लाखों में किसी-किसी के घर पैदा होता है ।”

“तो फिर उसको क्यों फटकारते हो ?” 

“ऐसा नहीं करता तो वह इतनी ऊँचाई तक पहुँचता भी नहीं । मेरे को इसको और ऊपर उठाना है ।”

छुप के सुन रहा बेटा विचार करने लगा, ‘अरे ! पिताजी के अंदर में तो महान बनाने का भाव है और बाहर से बोलते हैं कि ‘तू कुछ नहीं है, इतना किया तो क्या ? कुछ नहीं…’ और मैं ऐसे पिता को प्रणाम करने में भी हिचकिचाता हूँ ।’ उससे रहा नहीं गया, वह दौड़ा-दौड़ा चरणों में गिर पड़ा, जैसे सूखा बाँस गिरता है ।

बोला : “पिताजी ! माफ करो, माफ करो । मैं आपकी महानता को नहीं समझ पाया, मैं मूर्ख था । वास्तव में मैं मूर्ख था ! आपने मेरे को कितना ऊँचा उठाया ! अगर आप ऐसा नहीं करते तो मैं इतनी ऊँचाई तक नहीं पहुँचता । आपकी कृपा से मैं यहाँ तक पहुँचा और इससे भी उन्नत होऊँगा, आत्मानुभव को प्राप्त करूँगा लेकिन एक बार मेरे मन में आ गया कि ‘मेरे पिता सदा मेरे को डाँटते हैं तो ऐसे पिता का तो गला दबाना चाहिए ।’ ऐसा मेरे मन में पाप आ गया ।” 

फिर लड़के ने अपनी भूल का प्रायश्चित किया ।

ऑफिसों में या दूसरी जगह ऑडिट अथवा लेखा-परीक्षण होता है न, तो तुमने बढ़िया-बढ़िया क्या लिखा है, तुम्हारा आज तक का बढ़िया – बढ़िया लेखा – जोखा कौन सा है ऐसा थोड़े ही ऑडिटर या परीक्षक देखेगा ! ऑडिट का मतलब है ‘गलती कहाँ है ? कमी क्या है ?’ ऐसे ही हितैषी क्या सोचेगा ? कि कमी कहाँ है और कैसे निकले ?

अपने जीवन में जो कमी है उसको तुम देखो । दिखेगी तब जब तुम्हारे से दूर होगी । और तुम देखोगे नहीं तो तुम्हारे में बैठ जायेगी । तुम देखोगे तो तुम्हारे से दूर हो जायेगी । तो फिर उसको अपने में मानो नहीं । ‘यह जो कमी दिख रही है, मेरे में नहीं है, चित्त में है । चित्त का मैं द्रष्टा हूँ, साक्षी हूँ, ॐ आनंद…’ आप इस प्रकार का अभ्यास बनाओ तो कमियाँ भी निकलती जायेंगी और आत्मज्ञान की यात्रा भी होती जायेगी । यह युक्ति है ।

– ऋषि प्रसाद, नवंबर + दिसम्बर 2019

मातृ – पितृ पूजन का इतिहास

matru pitru pujan ka itihas

एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा ?

निर्णय लेने के लिए दोनों गय़े शिव-पार्वती के पास । शिव – पार्वती ने कहा : जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा ।

कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने । गणपति जी चुपके से एकांत में चले गये । थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया । जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं । अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा ।

फिर गणपति जी आये शिव – पार्वती के पास । माता – पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे । एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता – पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली ।

शिव – पार्वती ने पूछा : वत्स ! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की ?

गणपतिजी बोले : सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमयो पिता… सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है । पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है । पिता देवस्वरूप हैं । अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं । तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये ।

शिव – पुराण में आता है :

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः ।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम् ।।

“जो पुत्र माता – पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है ।”



माता-पिता व गुरुजनों की महत्ता

mata pita guru ki mahatta

युधिष्ठिर ने पूछा : पितामह ! धर्म का रास्ता बहुत बड़ा है और उसकी अनेकों शाखाएँ हैं । इनमें से किस धर्म को आप सबसे प्रधान एवं विशेष रूप से आचरण में लाने योग्य समझते हैं, जिसका अनुष्ठान करके मैं इहलोक और परलोक में भी धर्म का फल पा सकूँगा ।”

भीष्म ने कहा : 

मातापित्रोर्गुरूणां च पूजा बहुमता मम ।

इह युक्तो नरो लोकान् यशश्च महदश्नुते ।।

 राजन् ! मुझे तो माता – पिता तथा गुरुजनों की पूजा ही अधिक महत्व की वस्तु जान पड़ती है । इस लोक में इस पुण्यकार्य में संलग्न होकर मनुष्य महान यश और श्रेष्ठ लोक पाता है ।

(महाभारत, शांति पर्व : १०८.३ )

राजन् ! माता, पिता और गुरुजन जिस काम के लिए आज्ञा दें, उसका पालन करना ही चाहिए । इन तीनों की आज्ञा का कभी उल्लंघन न करें । जिस काम के लिए उनकी आज्ञा हो, ‘वह धर्म ही है’ ऐसा निश्चय रखना चाहिए ।

माता, पिता और गुरु – ये ही तीनों लोक हैं, ये ही तीनों आश्रम हैं, ये ही तीनों वेद हैं और ये ही तीनों अग्नियाँ है । पिता गार्हपत्य अग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरु आहवनीयाग्नि है। लौकिक अग्नियों से माता, पिता व गुरु, इन त्रिविध अग्नियों का गौरव अधिक है । इन तीनों की सेवा में यदि भूल न करोगे तो तुम तीनों लोकों को जीत लोगे । पिता की सेवा से इस लोक को, माता की सेवा से परलोक को तथा नियमपूर्वक गुरु की सेवा से ब्रह्मलोक को भी लाँघ जाओगे, इसलिए तुम इनके साथ सदैव अच्छा बर्ताव करो । ऐसा करने से तुम्हें उत्तम यश, परम कल्याण और महान फल देने वाले धर्म की प्राप्ति होगी ।इनको भोजन कराने से पहले स्वयं भोजन न करना । इन पर कभी भी कोई दोषारोपण न करना और सदा इनकी सेवा में संलग्न रहना – यही सबसे उत्तम पुण्य है । इनकी सेवा से तुम कीर्ति, पवित्र यश और उत्तम लोक

सब कुछ प्राप्त कर लोगे ।

सर्वेतस्यादृता लोका यस्यैते त्रय आदृताः ।

अनाटृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः कियाः॥

जिसने इन तीनों का आदर कर लिया, उसके द्वारा सम्पूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया, उसके सम्पूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं । (महाभारत, शांति पर्व: १०८.१२)

जिसने इन तीनों गुरुजनों का सम्मान नहीं किया, उसके लिए न यह लोक है न परलोक । उसे न इस लोक में यश मिलता है न परलोक में सुख । मैं तो सब तरह के शुभ कर्मों का अनुष्ठान करके इन गुरुजनों को ही अर्पण कर देता था । इससे उन कर्मों का पुण्य सौ गुना और हजार गुना बढ़ गया है तथा उसी का यह फल है कि आज तीनों लोक मेरी दृष्टि के सामने हैं । दस श्रोत्रियों से बढ़कर हैं आचार्य (कुलगुरु), दस आचार्यों से बड़ा है उपाध्याय (विद्यागुरु). दस उपाध्यायों से अधिक महत्व रखता है पिता और दस पिताओं से भी अधिक गौरव है माता का । माता का गौरव तो सारी पृथ्वी से भी बढ़कर है । उसके समान गौरव किसी का नहीं है । मगर मेरा विश्वास ऐसा है कि आत्मतत्व का उपदेश देने वाले गुरु का दर्जा माता – पिता से भी बढ़कर है । माता – पिता तो केवल इस शरीर को जन्म देते । आत्मतत्व का उपदेश देने वाले आचार्य द्वारा जो जन्म होता है, यह दिव्य है, अजर-अमर है ।

माता – पिता यदि कोई अपराध करें तो भी उन पर हाथ नहीं उठाना चाहिए ।

वाचावृणोत्यवितबेन कर्मणा ऋतं ब्रुवन्ननृतं सम्प्रयच्छन् ।

संवैमन्येत पितरं मातर च तस्मै न द्रुहोत् कृतमस्य जानन् ।।

“जो सत्यकर्म (के द्वारा और यथार्थ उपदेश) के द्वारा पुत्र या शिष्य को कवच की भाँति ढक लेता है, सत्यस्वरूप वेद का उपदेश देता है और असत्य की रोकथाम करता है, उस गुरु को ही पिता और माता माने और उसके उपकार को जानकर कभी उससे द्रोह न करें ।’

 (महाभारत, शांति पर्व : १०८.२२)

जो लोग विद्या पढ़कर गुरु का आदर नहीं करते, निकट रहते हुए भी मन, वाणी अथवा क्रिया द्वारा गुरु की सेवा नहीं करते, उन्हें गर्भस्थ बालक की हत्या से भी बड़ा पाप लगता है । संसार में उससे बड़ा पापी दूसरा कोई नहीं जैसे गुरुओं का कर्तव्य है शिष्यों को आत्मोन्नति पथ पर पहुँचाना, उसी तरह शिष्यों का धर्म है गुरुओं का पूजन करना ।

मनुष्य जिस धर्म से पिता को प्रसन्न करता है, उसी के द्वारा प्रजापति ब्रह्माजी भी प्रसन्न होते हैं तथा जिस बात से वह माता को प्रसन्न कर लेता है उसी के द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी की पूजा हो जाती है । परंतु जिस व्यवहार से शिष्य अपने गुरु को प्रसन्न कर लेता है, उसके द्वारा परब्रह्म परमात्मा की पूजा सम्पन्न होती है, इसलिए गुरु माता – पिता से भी अधिक पूजनीय हैं । गुरुओं के पूजित होने पर पितरों सहित देवता और ऋषि भी प्रसन्न होते हैं, इसलिए गुरु परम पूजनीय हैं ।

जो लोग मन, वाणी और क्रिया द्वारा गुरु, पिता व माता से द्रोह करते हैं, उन्हें गर्भहत्या का पाप लगता है, जगत में उनसे बढ़कर और कोई पापी नहीं है । मित्रद्रोही, कृतघ्न, स्त्री – हत्यारा और गुरुघाती – इन चारों के पाप का प्रायश्चित हमारे सुनने में नहीं आया है ।

अतः माता, पिता और गुरु की सेवा ही मनुष्य के लिए परम कल्याणकारी मार्ग है । इससे बढ़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं है । सम्पूर्ण धर्मों का अनुसरण करके यहाँ सबका सार बताया गया है ।

 (‘महाभारत’ के शांति पर्व से)

क्या अपना कल्याण चाहने वाले आज के युवक – युवतियाँ भीष्मजी के ये शास्त्र – सम्मत वचन बार-बार विचार कर अपना कल्याण नहीं करेंगे ? ‘गर्भ-हत्यारों की कतार में आना है या श्रेष्ठ पुरुष बनना है ?’- ऐसा अपने – आपसे पूछा करो । अभी भी समय है, चेत जाओ ! समय है भैया !… सावधान !!..

  • अपने से उम्र में, ज्ञान में बड़े व्यक्ति को ‘आप’ कहकर संबोधित करें ।
  • सुनें अधिक, बोलें बहुत कम । बोलें तो सत्य हितकारी, प्रिय और मधुर वचन बोलें । 
  • ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ उन्नत जीवन का एक साधन है ।
  • किसी की निंदा न करें न सुनें, किसी की हँसी न उड़ायें ।
  • स्वच्छता  -प्रेमी स्वावलम्बी बनें ।

अमृतबिंदु : अरे ! तुम आत्मा हो । निष्फिक्र, निश्चिन्त एवं निर्भय होकर जियो । जो हो गया उसे सपना समझो । जो हो रहा है वह भी सपना है । जो होगा वह भी एक दिन सपना हो जायेगा ।

– पूज्य बापूजी

– ऋषि प्रसाद / अगस्त 2006

पिता को खोजने गया, परम पिता को पा लिया

mata pita bhakti story

एक बालक बचपन में ही पितृहीन हो गया था, एक दिन उसने अपनी माँ से पूछा : “माता ! मेरे सभी साथी अपने – अपने पिता की बात करते हैं, क्या मेरे पिता नहीं हैं ? यदि हैं तो वे कहाँ हैं ?”

बालक के इस सवाल को सुन माता के नेत्र भर आये पर यह सत्संगी माता उदास नहीं हुई । लड़के का हाथ पकड़कर पास के ही गोपाल जी के मंदिर में ले गयी और भगवान के श्रीविग्रह की ओर संकेत करके कहा : “देखो बेटा ! ये ही तुम्हारे पिता हैं ।”

बालक पर माता का वह एक वाक्य जादू – सा काम कर गया । वह गोपाल जी को पिताजी – पिताजी कहकर प्रेमपूर्वक पुकारने लगा । नित्य मंदिर जाकर गोपालजी से बातें करता, पुकारता : “हे पिताजी ! तुम मुझे दर्शन क्यों नहीं देते ?” अनजाने में ही वह बालक सर्वेश्वर परमात्मा की विरह भक्ति के पथ पर तीव्रता से आगे बढ़ने लगा ।

एक दिन वह मंदिर में गया और दृढ़ संकल्प करके वहीं बैठ गया कि ‘मुझे मरना स्वीकार है परंतु अब तुम्हारे बिना नहीं रहा जाता । जब तक तुम मेरे पास आकर मुझे अपनी छाती से नहीं लगाओगे तब तक मैं यहाँ से हटने वाला नहीं हूँ ।’

आधी रात हो गयी । ध्यान करते – करते वह अपने शरीर की सुध-बुध भूल गया ।

गीता (४.११) में भगवान कहते हैं : ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।

जो लोग मुझे जिस प्रकार भजते हैं मैं भी उनको उसी प्रकार भजता हूँ, उन पर उसी प्रकार कृपा करता हूँ ।

भक्त प्रहाद की दृढ निष्ठा ने जैसे स्तम्भ में से भगवान को प्रकट कर दिया था वैसे ही निर्दोष हृदय बालक की अपनत्व भरी पुकार व निष्ठा ने मूर्ति में से भगवान को प्रकट होने के लिए विवश कर दिया ।

भगवान ने भक्त की भावना के अनुसार उसे दर्शन देकर अपने गले लगाया, आशीर्वाद दिया और अंतर्धान हो गये ।

भगवद्-स्पर्श पाकर बालक की कवित्व शक्ति जाग उठी । बह भगवतप्रेम से भरकर ऐसे-ऐसे पद रचता और गाता कि सुनने वाले लोग गद्गद हो जाते, उनके हृदय में भगवद्भक्ति की तरंगें उठने लगतीं। आगे चलकर बालक ने संतत्व को उपलब्ध हो भगवान का अपने अंतरात्मा और व्यापक परमात्मा के रूप में भी साक्षात्कार कर लिया ।

कैसी सूझबूझ है उस सत्संगी माँ की ! न तो स्वयं निराश हुई न बेटे के हृदय को चोट पहुँचने दी बल्कि बेटे को ऐसी दिशा में मोड़ दिया कि वह अपने परम पिता को पाने में सफल हो गया ।

जो भक्त दृढ़ता से ईश्वर के मार्ग पर चल पड़ते हैं वे अपने परम लक्ष्य परमात्मा को पा ही लेते हैं । 

– पूज्य बापूजी

 

– ऋषि प्रसाद, अक्टूबर 2020

Why to Celebrate Matru Pitru Pujan Divas instead Valentines Day

Why to Celebrate Matru Pitru Pujan Divas instead Valentines day

14th February 2021 Ko Matru Pitru Pujan Divas Kyu Manaye [Why to Celebrate MPPD on 14th February instead of Valentines Day]

माता – पिता ने हमसे अधिक वर्ष दुनिया में गुजारे हैं, उनका अनुभव हमसे अधिक है और सदगुरु ने जो महान अनुभव किया है उसकी तो हमारे छोटे अनुभव से तुलना ही नहीं हो सकती । इन तीनों के आदर से उनका अनुभव हमें सहज में ही मिलता है । अतः जो भी व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता है, उस सज्जन को माता – पिता और सदगुरु का आदर पूजन आज्ञापालन तो करना चाहिए, चाहिए और चाहिए ही ! 14 फरवरी को ʹवेलेंटाइन डेʹ  मनाकर युवक – युवतियाँ प्रेमी – प्रेमिका के संबंध में फँसते हैं । वासना के कारण उनका ओज – तेज दिन दहाड़े नीचे के केन्द्रों में आकर नष्ट होता है । उस दिन ʹमातृ – पितृ पूजनʹ काम – विकार की बुराई व दुश्चरित्रता की दलदल से ऊपर उठाकर उज्ज्वल भविष्य, सच्चरित्रा, सदाचारी जीवन की ओर ले जायेगा ।

अनादिकाल से महापुरुषों ने अपने जीवन में माता – पिता और सदगुरु का आदर – सम्मान किया है । पूज्य बापूजी ने भी बाल्यकाल से ही अपने माता – पिता की सेवा की और उनसे ये आशीर्वाद प्राप्त किये :

पुत्र तुम्हारा जगत में, सदा रहेगा नाम। लोगों के तुमसे सदा, पूरण होंगे काम। ।

पूज्य श्री अपने सदगुरु भगवत्पाद साँई श्री लीलाशाहजी महाराज की आज्ञा में रहकर खूब श्रद्धा व प्रेम से गुरुसेवा करते थे। माता – पिता और सदगुरु की कैसी सेवा – पूजा करनी चाहिए इसका प्रत्यक्ष उदाहरण पूज्यश्री के जीवन में देखने को मिलता है । उनकी सेवा से संतुष्ट माता – पिता और सदगुरु ने उन्हें कोई कमी भी नहीं रखी । इसका वर्णन करते हुए पूज्य बापूजी कहते हैं – “मैं अपने – आप में बहुत संतुष्ट हूँ । पिता ने संतोष के कई बार उदगार निकाले और आशीर्वाद भी देते थे । माँ भी बड़ी संतुष्ट रही और सदगुरु भी संतुष्ट रहे तभी तो महाप्रयाण मेरी गोद में किये और उऩ्हीं की कृपा मेरे द्वारा मेरे साधकों और श्रोताओं को संतुष्ट कर रही है, अब मुझे क्या चाहिए ! जो मुझे सुनते हैं, मिलते हैं, वे भी संतुष्ट होते हैं तो मुझे कमी किस बात की रही !”

कोई हिन्दू, ईसाई, मुसलमान, यहूदी नहीं चाहते कि हमारे बच्चे विकारों में खोखले हो जायें, माता – पिता व समाज की अवज्ञा करके विकारी और स्वार्थी जीवन जीकर तुच्छ हो जायें और बुढ़ापे में कराहते रहें । बच्चे माता – पिता व गुरुजन का सम्मान करें तो उनके हृदय से विशेष मंगलकारी आशीर्वाद उभरेगा, जो देश के इन भावी कर्णधारों को ʹवेलेन्टाइन डेʹ जैसे विकारों से बचाकर गणेश जी की नाईं इऩ्द्रिय – संयम व आत्मसामर्थ्य विकसित करने में मददरूप होगा । माता, पिता एवं गुरुजनों का आदर करना हमारी संस्कृति की शोभा है । माता – पिता इतना आग्रह नहीं रखते कि संतानें उनका सम्मान – पूजन करें परंतु बुद्धिमान, शिष्ट संतानें माता – पिता का आदर पूजन करके उनके शुभ संकल्पमय आशीर्वाद से लाभ उठाती हैं ।

14 विकसित और विकासशील देशों के बच्चों व युवाओं में किये गये सर्वेक्षण में यह स्पष्ट हुआ है कि भारतीय बच्चे, युवक सबसे अधिक सुखी और स्नेही पाये गये । लंदन व न्यूयार्क में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसका एक बड़ा कारण है-भारतीय लोगों का पारिवारिक स्नेह एवं निष्ठा ! भारतीय युवाओं ने कहा कि ʹउनके जीवन में प्रसन्नता लाने तथा समस्याओं को सुलझाने में उनके माता – पिता का सर्वाधिक योगदान है ।ʹ भारत में माता – पिता हर प्रकार से अपने बच्चों का पोषण करते हैं और माता – पिताओं का पोषण संतजनों से होता है। माता – पिता, बच्चे – युवक सभी को पोषित करने वाला पूज्य बापूजी द्वारा प्रेरित ʹमातृ – पितृ पूजन दिवसʹ इस निष्कर्ष की पुष्टि करता है ।

महान बनना सभी चाहते हैं, तरीके भी आसान हैं । बस, आपको चलना है । महापुरुषों के जीवन – चरित्र को आदर्श बनाकर आप सही कदम बढ़ायें, जरूर बढ़ायें । आपसे कइयों को उम्मीद है । हम भी आपके उज्ज्वल भविष्य की अपेक्षा करते हैं ।

– मातृ पितृ पूजन 2012 साहित्य से…