शास्त्रों में आता है कि जिसने माता – पिता तथा गुरू का आदर कर लिया, उसके द्वारा संपूर्ण लोकों का आदर हो गया और जिसने इनका अनादर कर दिया उसके संपूर्ण शुभ कर्म निष्फल हो गये । वे बड़े ही भाग्यशाली हैं, जिन्होंने माता – पिता और गुरू की सेवा के महत्व को समझा तथा उनकी सेवा में अपना जीवन सफल किया । ऐसा ही एक भाग्यशाली सपूत था – पुण्डलिक ।

पुण्डलिक अपनी युवावस्था में तीर्थयात्रा करने के लिए निकला । यात्रा करते – करते काशी पहुँचा । काशी में भगवान विश्वनाथ के दर्शन करने के बाद उसने लोगों से पूछा : क्या यहाँ कोई पहुँचे हुए महात्मा हैं, जिनके दर्शन करने से हृदय को शांति मिले और ज्ञान प्राप्त हो ?

लोगों ने कहा : हाँ हैं । गंगा पार कुक्कुर मुनि का आश्रम है । वे पहुँचे हुए आत्मज्ञानी संत हैं । वे सदा परोपकार में लगे रहते हैं । वे इतनी उँची कमाई के धनी हैं कि साक्षात माँ गंगा, माँ यमुना और माँ सरस्वती उनके आश्रम में रसोईघर की सेवा के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं ।

पुण्डलिक के मन में कुक्कुर मुनि से मिलने की जिज्ञासा तीव्र हो उठी । पता पूछते – पूछते वह पहुँच गया कुक्कुर मुनि के आश्रम में । मुनि के देखकर पुण्डलिक ने मन ही मन प्रणाम किया और सत्संग वचन सुने । इसके पश्चात पुण्डलिक मौका पाकर एकांत में मुनि से मिलने गया । मुनि ने पूछा : वत्स ! तुम कहाँ से आ रहे हो ?

पुण्डलिक : मैं पंढरपुर (महाराष्ट्र) से आया हूँ ।

तुम्हारे माता – पिता जीवित हैं ?

हाँ हैं ।

तुम्हारे गुरू हैं ?

हाँ, हमारे गुरू ब्रह्मज्ञानी हैं ।

कुक्कुर मुनि रूष्ट होकर बोले : पुण्डलिक ! तू बड़ा मूर्ख है । माता – पिता विद्यमान हैं, ब्रह्मज्ञानी गुरू हैं फिर भी तीर्थ करने के लिए भटक रहा है ? अरे पुण्डलिक ! मैंने जो कथा सुनी थी उससे तो मेरा जीवन बदल गया । मैं तुझे वही कथा सुनाता हूँ । तू ध्यान से सुन ।

एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा ?

निर्णय लेने के लिए दोनों गये शिव-पार्वती के पास । शिव – पार्वती ने कहा : जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा ।

कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने । गणपति जी चुपके से एकांत में चले गये । थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया । जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं । अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा ।

फिर गणपति जी आये शिव – पार्वती के पास । माता – पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र – पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे । एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता – पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली ।

शिव – पार्वती ने पूछाः वत्स ! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की ?

गणपति जी : सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमयो पिता… सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है । पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है । पिता देवस्वरूप हैं। अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं । तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये ।

शिव-पुराण में आता है :-

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः ।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम् ।।

अपहाय गृहे यो वै पितरौ तीर्थमाव्रजेत ।

तस्य पापं तथा प्रोक्तं हनने च तयोर्यथा ।।

पुत्रस्य य महत्तीर्थं पित्रोश्चरणपंकजम् ।

अन्यतीर्थं तु दूरे वै गत्वा सम्प्राप्यते पुनः ।।

इदं संनिहितं तीर्थं सुलभं धर्मसाधनम् ।

पुत्रस्य च स्त्रियाश्चैव तीर्थं गेहे सुशोभनम् ।।

जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है । जो माता – पिता को घर पर छोड़ कर तीर्थयात्रा के लिए जाता है, वह माता – पिता की हत्या से मिलने वाले पाप का भागी होता है क्योंकि पुत्र के लिए माता – पिता के चरण – सरोज ही महान तीर्थ हैं । अन्य तीर्थ तो दूर जाने पर प्राप्त होते हैं परंतु धर्म का साधनभूत यह तीर्थ तो पास में ही सुलभ है । पुत्र के लिए (माता-पिता) और स्त्री के लिए (पति) सुंदर तीर्थ घर में ही विद्यमान हैं ।

(शिव पुराण, रूद्र सं.. कु खं.. – 20)

पुण्डलिक मैंने यह कथा सुनी और अपने माता – पिता की आज्ञा का पालन किया । यदि मेरे माता-पिता में कभी कोई कमी दिखती थी तो मैं उस कमी को अपने जीवन में नहीं लाता था और अपनी श्रद्धा को भी कम नहीं होने देता था । मेरे माता – पिता प्रसन्न हुए । उनका आशीर्वाद मुझ पर बरसा । फिर मुझ पर मेरे गुरूदेव की कृपा बरसी इसीलिए मेरी ब्रह्मज्ञान में स्थिति हुई और मुझे योग में भी सफलता मिली । माता – पिता की सेवा के कारण मेरा हृदय भक्तिभाव से भरा है । मुझे किसी अन्य इष्टदेव की भक्ति करने की कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी ।

मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदवो भव ।

मंदिर में तो पत्थर की मूर्ति में भगवान की कामना की जाती है जबकि माता – पिता तथा गुरूदेव में तो सचमुच परमात्मदेव हैं, ऐसा मानकर मैंने उनकी प्रसन्नता प्राप्त की । फिर तो मुझे न वर्षों तक तप करना पड़ा, न ही अन्य विधि – विधानों की कोई मेहनत करनी पड़ी । तुझे भी पता है कि यहाँ के रसोईघर में स्वयं गंगा-यमुना-सरस्वती आती हैं । तीर्थ भी ब्रह्मज्ञानी के द्वार पर पावन होने के लिए आते हैं । ऐसा ब्रह्मज्ञान माता – पिता की सेवा और ब्रह्मज्ञानी गुरू की कृपा से मुझे मिला है ।

पुण्डलिक तेरे माता – पिता जीवित हैं और तू तीर्थों में भटक रहा है ?

पुण्डलिक को अपनी गलती का एहसास हुआ । उसने कुक्कुर मुनि को प्रणाम किया और पंढरपुर आकर माता – पिता की सेवा में लग गया ।

माता – पिता की सेवा ही उसने प्रभु की सेवा मान ली । माता – पिता के प्रति उसकी सेवानिष्ठा देखकर भगवान नारायण बड़े प्रसन्न हुए और स्वयं उसके समक्ष प्रकट हुए । पुण्डलिक उस समय माता – पिता की सेवा में व्यस्त था । उसने भगवान को बैठने के लिए एक ईंट दी ।

अभी भी पंढरपुर में पुण्डलिक की दी हुई ईंट पर भगवान विष्णु खड़े हैं और पुण्डलिक की मातृ – पितृभक्ति की खबर दे रहा है पंढरपुर तीर्थ ।

यह भी देखा गया है कि जिन्होंने अपने माता-पिता तथा ब्रह्मज्ञानी गुरू को रिझा लिया है, वे भगवान के तुल्य पूजे जाते हैं । उनको रिझाने के लिए पूरी दुनिया लालायित रहती है। वे मातृ – पितृभक्ति से और गुरूभक्ति से इतने महान हो जाते हैं ।

– मातृ पितृ पूजन साहित्य से…