Bhagwan Shri Krishna Ke Priya Anmol Ratan: Gau Aur Geeta

Shri Krishna ke anmol ratan gau aur geeta

Lord Shri Krishna’s Favourite Things/ Animal ➠ भगवान श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण जीवन मानवजाति के लिए एक महान आदर्श है ही परन्तु उनके जो दो प्रिय अनमोल रत्न हैं वे भी सभी के लिए आदरणीय,माननीय हैं। भगवान के वे दो रत्न हैं ‘गौ’ और ‘गीता’ ।

‘गौ” शारीरिक एवं बौद्धिक विकास की संजीवनी है तो ‘गीता’ आत्मिक विकास के लिए संजीवनी अमृत है। भारतवासी यदि इन दो का आदर करना सीख लें तो विश्व में ऐसी कोई भी शक्ति नहीं जो इस देश पर आघात लगा सके। श्रीकृष्ण का जीवन जितना अनमोल है उतने ही अनमोल उनके ये दो रत्न भी हैं।

➠ श्रीमद्भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान के कारण सम्पूर्ण भारतवासियों ने ही नहीं अपितु सुज, महात्मा थोरो. एमर्सन आदि कई विदेशी मूर्धन्य विद्वानों ने भी श्रीकृष्ण के चरणों में अपना सिर झुकाया है। रसखान, मीर, पीरजादा और ताजबेगम आदि श्रीकृष्ण की भक्ति के रंग में रंगकर अपने जीवन को उज्ज्वल बना लेते हैं।

➢  सन् १९४० की घटित घटना है : प्रसिद्ध गामा पहलवान

➠ पहलवान (जिसका मूल नाम गुलाम हुसैन था) से पत्रकार जैका फ्रेड ने पूछा:

“आप एक हजार से भी ज्यादा भर्तियां खेल चुके हैं। कसम खाने के लिए भी लोग दो-पाँच कुश्ती हार जाते हैं। आपने हजारों कुश्तियों में विजय पाई है और आज तक हारे नहीं हैं। आपकी इस विजय का रहस्य क्या है ?”

➠ अजीज हुसैन के पुत्र गुलाम हुसैन (गामा पहलवान) ने कहा: “मैं किसी औरत की तरफ बुरी नजर से नहीं देखता हूँ। मैं जब कुश्ती में उतरता हूँ तो गीतानायक श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ और बल की प्रार्थना करता हूँ। इसीलिए हजारों कुश्तियों में मैं एक भी कुश्ती हारा नहीं हूँ, यह श्रीकृष्ण की दुआ है।”

➠ ऐसे सर्वगुण सम्पन्न, लीलापुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की जयंती को उत्साह, प्रेम एवं भक्ति भाव के साथ मनाना हम भारतवासियों के लिए परम सौभाग्य की बात है।

~ लोक कल्याण सेतु / जुलाई-अगस्त 2001

Freedom Fighters Played Role as “Gau Rakshak”

freedom fighter played role as Gau Rakshak

भारत में गौहत्या विशेषकर अंग्रेजों का शासन स्थापित होने पर शुरू हुई । यहाँ पहले गौहत्या न के बराबर ही होती थी लेकिन अंग्रेजों ने इसे बढ़ावा दिया । भारत में स्वतंत्रता के बीज का अंकुरण गौ के कारण ही हुआ ।

1857 ई. में जब अंग्रेज सरकार ने कारतूसों में गाय की चरबी का प्रयोग शुरू किया तो गौभक्त भारतीय सिपाही यह सहन न कर पाये कि विदेशी विधर्मी अंग्रेज सरकार गाय की चर्बी के माध्यम से पवित्र वैदिक धर्म नष्ट करे ।

वीर मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी (मेरठ) में गाय की चरबी लगे अपवित्र कारतूसों को छूने से इनकार करके खुला विद्रोह किया । इस विद्रोह के परिणाम स्वरूप भारत में प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हुआ ।

झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई केवल स्वतंत्रता ही नहीं बल्कि गौरक्षा के लिए भी आजादी की लड़ाई में कूदी थीं और अंग्रेजी सैनिकों से लोहा लिया था ।

अंग्रेजों ने गोरी फौज का पेट भरने के लिए हिन्दुओं के पवित्र तीर्थस्थानी में गौओं को काटना प्रारम्भ कर दिया था । इससे अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा और असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक था ।

1857 की क्रांति के बाद स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपत राय, हासानंद, पं. मदनमोहन मालवीयजी, लोकमान्य तिलक, चौधरी चरण सिंह आदि ने स्वतंत्रता आंदोलन को सक्रिय हुआ  था। इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वाधीन भारत में गौहत्या का कलंक पूरी तरह मिटाने का संकल्प लिया था । कई गौभक्तों ने बलिदान भी दिया । 

सन् 1921 के पावन गोपाष्टमी पर्व पर दिल्ली के ‘शहीदी हॉल’ में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता और महात्मा गांधी की उपस्थिति में एक सम्मेलन हुआ । उसमें सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘अंग्रेजी राज्य में गौहत्या होती है अतः इस राज्य को सहयोग नहीं किया जाए ।’

 

पं. मदनमोहन मालवीयजी ने जनवरी 1928 में प्रयाग में त्रिवेणी के पावन तट पर ‘अखिल भारतीय सनातन धर्म महासभा’ के अधिवेशन में हाथ में गंगाजल लेकर प्रतिज्ञा की थी कि स्वतंत्र भारत का जो संविधान बनेगा. उसके प्रथम परिच्छेद में ही गौ हत्या बंदी की कलम होगी ।

गौहत्या बड़ा-से-बड़ा महापाप है । गौवंश की रक्षा में ही देश की रक्षा समायी है । हम जीवनभर गौरक्षा तथा गौसेवा के लिए प्रयासरत रहेंगे ।

गांधीजी कहते थे : “मानव-विकास के इतिहास में गौरक्षा को मैं एक महत्त्वपूर्ण घटना मानता हूँ । मैं तो गौरक्षा को स्वराज्य से भी अधिक महत्व का प्रश्न मानता हूँ ।”

स्वामी श्रद्धानंद कहते थे : “गौमाता सब सुख-सम्पत्ति की दात्री है इसलिए इसकी रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए ।”

– लोक कल्याण सेतु / नवम्बर 2017

Gau Raksha: Saving Humanity, Health & Culture

Gau raksha me hai manavata, swasthya v sanskriti ki raksha

-पूज्य बापूजी

गाय की रक्षा करने वाले हम कौन होते हैं ? अरे ! गाय तुम्हारी-हमारी और पर्यावरण की रक्षा करती है ।

चौरासी लाख प्राणी हैं किंतु देशी गाय के अलावा किसी का मल और मूत्र पवित्र नहीं माना जाता । चाहें कोई महाराजा हो, ब्राह्मण हो या तपस्वी हो फिर भी उसका मल-मूत्र लीपने के काम नहीं आता ।

जब कोई व्यक्ति मरने की स्थिति में होता है तब भूमि को देशी गाय के गोबर व मूत्र से लीपन कर उस पर उस व्यक्ति को लिटाते हैं ताकि उसकी सद्गति हो । देशी गाय के दूध, दही, घी, मूत्र में सुवर्णक्षार होते हैं ।

अगर किसी महिला को प्रसूति नहीं हो रही हो तो देशी गाय के गोबर का १० ग्राम ताजा रस पिलाने से सरलता से प्रसूति हो जाती है । किसी को कैंसर की बीमारी है तो प्रतिदिन गौ का मूत्र सेवन कराओ, ठीक हो जायेगा ।

राजतिलक के समय राजा को पंचगव्य (देशी गाय का दूध, दही, घी, मूत्र व गोबर-रस) पिलाने व उससे राजतिलक करने से राजा राज्य अच्छा चलायेगा ।

किसी भी खेत में थोड़े दिन देशी गाय को रखो फिर देखो वह खेत कितना फसल-उत्पादन देता है ।

गाय को सानी (पानी में भिगोयी हुई खली व भूसा), चारा आदि रखो या न रखो, केवल उसके सामने उसका बछड़ा लाने पर वह दूध देने लगेगी जबकि भैंस तो ऐसी स्वार्थी होती है कि सानी देखकर ही दूध देती है । यदि आप चाहते हो कि आपके बच्चे आगे चलकर अति स्वार्थी, अहंकारी बन के आपस में झगड़ें नहीं, भाई-भाई आपस में स्वार्थ,सम्पदा के कारण न लड़ें तो बच्चों को देशी गाय का दूध पिलायें ।

भैंस के  पाड़े आपस में लड़ते हैँ तो ऐसे लड़ते हैं कि छोड़ते ही नहीं, चाहें कितने ही डंडे मारो । डंडे टूट जायें तो भी वे लड़ना नहीं छोड़ते, भिड़े रहते हैं दो-दो दिन तक । बच्चे भैंस का दूध पीते हैं तो आगे चलकर ये सम्पत्ति, जमीन-जायदाद के लिए मुकदमेबाजी करते हैं व हथियार उठाते हैं लेकिन यदि गाय का दूध पीते हैं तो जैसे भगवान राम कहते हैं : ‘भरत राज्य करे ।’ और भरत जी कहते हैं : ‘नहीं, रामजी राज्य करें।’ – इस प्रकार भाई, भाई के चरणों में राज्य अर्पित कर देते हैं ।

औरंगजेब भैंस का दूध पीकर ऐसा हो गया था कि अपने बाप को ही जेल में डाला व राज्य करने लगा । गौ-सेवा करने वाले के दिल में खुशी होती है ।

गाय पालने वाले के घर में जितनी तंदुरुस्ती होगी उतनी गाय का मांस खाने वाले के घर में नहीं होगी, बिल्कुल पक्की बात है ! जो भी गौ- पालक हैं, उनको मैं धन्यवाद देता हूँ, प्रणाम करता है । 

दुर्भाग्यवश आज के लोग गाय का दर्शन, गाय के दूध व गौ-किरणों का प्रभाव भूल गये हैं । इसी कारण घर-घर में लोग बीमार पड़े हैं, शल्यक्रिया (ऑपरेशन) करा रहे हैं ।

आज कहीं अकाल पड़ रहा है, कहीं अतिवृष्टि हो रही है और कहीं मुकदमे हो रहे हैं । धन-धान्य भी इतना ठीक नहीं होता, मानो पृथ्वी ने रस खींच लिया है और फूलों ने खिलना भी कम कर दिया है ।

यह कहना बिल्कुल गलत है कि हम गाय की रक्षा करते हैं । हम गाय की नहीं बल्कि गाय हमारी रक्षा करती है । गौ-रक्षा हमारी आधारभूत आवश्यकता है । हम अपनी रक्षा के लिए गौ-रक्षा करते हैं, गौ तो कभी नहीं बोलती कि “मेरी रक्षा करो।” बुद्धिमान समझते हैं कि गाय की रक्षा में स्वास्थ्य, मानवता, संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा है ।

– ऋषि प्रसाद / नवम्बर 2017

Why Indian Desi Cow is Called as Gau Mata of India and World

why indian desi cow is called gau mata of india and world

Know Why Cow is called Gau Mata/ Mother in Hindi.  Why do hindu worship cow? 

हम गाय की सेवा करेंगे तो गाय से हमारी सेवा होगी । सेवक कैसा होना चाहिए इस पर विचार करने से लगता है कि सेवक के हृदय में एक मधुर-मधुर पीड़ा रहनी चाहिए और उत्साह रहना चाहिए, निर्भयता रहनी चाहिए एवं असफलता देखकर उसे कभी भी निराश नहीं होना चाहिए ।

सेवक से सेवा होती है, सेवा से कोई सेवक नहीं बना करता ।

इस देश में ही नहीं, समस्त विश्व में मानव और गाय का ऐसा सम्बंध है जैसे मानव-शरीर के साथ प्राणों का ।

अन्य देशों में गाय का सम्बंध आत्मीय नहीं रहा, कहीं आर्थिक बना दिया गया, कहीं कुछ बना दिया गया (यह वक्तव्य उस समय का है जिस समय भारत में इतने कत्लखाने नहीं खुले थे) ।

मेरे ख्याल से गाय का सम्बंध आत्मीय सम्बंध है। गाय मनुष्य मात्र की माता है ।

मेरे दिल में एक दर्द है कि कोई घर ऐसा न हो जिसमें गाय न हो, गाय का दूध न हो । हर घर में गाय हो और गाय का दूध पीने को मिलना चाहिए । गाय ने मानवबुद्धि की रक्षा की है ।

बेईमानी का समर्थन करना और उससे एक-दूसरे पर अधिकार जमाना – यह प्रवृत्ति आज बढ़ती जा रही है ।

इसका कारण है कि बुद्धि सात्त्विक नहीं है, बुद्धि सात्त्विक क्यों नहीं है ? कारण, मन सात्त्विक नहीं है। मन सात्त्विक क्यों नहीं है ? कारण, शरीर सात्त्विक नहीं है । शरीर सात्त्विक नहीं है तो इसका कारण? आहार सात्त्विक नहीं है ।

गाय के दूध में, घी में स्वर्ण क्षार होते हैं, सात्त्विकता होती है । गाय के शरीर में से गोशक्ति के प्रभाव से

चौबीसों घंटे सात्त्विक तरंगें निकलती हैं । इसी कारण राजसी-तामसी शक्तियों की बाधा के शिकार बने बच्चों को गाय की पूंछ से झाडा जाता था । पूतना राक्षसी द्वारा नन्हे श्रीकृष्ण को भगा ले जाने के प्रसंग के बाद श्रीकृष्ण को भी गाय की पूँछ से झाड़ा गया था ।

जैसे-जैसे आप गोसेवा करते जायेंगे, वैसे-वैसे आपको यह मालूम होता जायेगा कि गाय आपकी सेवा कर रही है । स्वास्थ्य की दृष्टि से, बौद्धिक दृष्टि से और हर दृष्टि से आपको यह लगेगा कि आप गाय की सेवा कर रहे हैं तो गाय आपकी हर तरह से सेवाकर रही है ।

हम सच्चे सेवक होंगे तो हमारी सेवा होगी, हमारी सेवा का मतलब मानव-जाति की सेवा होगी । मानवमात्र की सेवा से ही सब कुछ हो सकता है। जब मानव सुधरता है तो सब कुछ सुधरता है और जब मानव बिगड़ता है तो सब कुछ बिगड़ जाता है ।

मानव को सात्विक आहार, सात्विक संग, श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत आदि सत्शास्त्रों का पठन-मनन और सत्संग-श्रवण करना चाहिए । उसका मंगल इसमें है कि वह सद्गुण बढ़ाता जाय ।

– ऋषि प्रसाद, जुलाई 2005

Advantages/ Importance of Indian Desi Cow [देसी गाय]

importance of Indian desi cow

भारतीय गायें विदेशी तथाकथित गायों की तरह बहुत समय तक जंगलों में हिंसक पशु के रूप में घूमते रहने के बाद घरों में आकर नहीं पलीं, वे तो शुरू से ही मनुष्यों द्वारा पाली गयी हैं ।

भारतीय गायों के लक्षण हैं उनका गल-कम्बल (गले के नीचे झालर-सा भाग), पीठ का कूबड़, चौड़ा माथा, सुंदर आँखें तथा बड़े मुड़े हुए सींग । भारतीय गोवंश की कुछ प्रमुख नस्लें हैं गिर, थारपारकर, साहीवाल, लाल सिंधी आदि ।

भारतीय गायों पर करनाल की ‘नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेस (एनबीएजीआर) संस्था ने अध्ययन कर पाया कि इनमें उन्नत ‘A-2 एलील जीन’ पाया जाता है, जो इन्हें स्वास्थ्यवर्धक दूध उत्पन्न करने में मदद करता है ।

भारतीय नस्लों में इस जीन की आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) 100 प्रतिशत तक पायी जाती है, जबकि विदेशी नस्लों में यह 60 प्रतिशत से भी कम होती है ।

भारतीय गोवंश में गर्मी, सर्दी तथा वर्षा को सहने की क्षमता होती है । बरसात में इनकी त्वचा से तैलीय पदार्थ के निकलने से उन्हें वर्षा से होने वाला कोई संक्रमण नहीं होता ।

भारतीय गायों में ‘सूर्यकेतु नाड़ी’ होती है । गायें अपने लम्बे सींगों के द्वारा सूर्य की किरणों को इस सूर्यकेतु नाड़ी तक पहुँचाती हैं । इससे सूर्यकेतु नाड़ी स्वर्णक्षार बनाती है, जिसका बड़ा अंश दूध में और अल्पांश गोमूत्र में आता है ।

भारतीय गाय के दूध में ‘ओमेगा-6’ फैटी एसिड होता है, जिसकी कैंसर-नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका है ।

विदेशी नस्ल की गायों के दूध में इसका नामोनिशान तक नहीं है । भारतीय गाय के दूध में अनसैचुरेटेड फैट होता है, इससे धमनियों में वसा नहीं जमती और यह हृदय को भी पुष्ट करता है ।

भारतीय गाय चरते समय यदि कोई विषैला पदार्थ खा लेती है तो दूसरे प्राणियों की तरह वह विषैला तत्व दूध में मिश्रित नहीं होता भारतीय गाय संसार के एकमात्र ऐसा प्राणी है जिसके मल-मूत्र का औषधि तथा यज्ञ-पूजा आदि में उपयोग होता है ।

परमाणु विकिरण से बचने में गाय का गोबर उपयोगी होता है । भारतीय गाय के गोबर-गोमूत्र में रेडियोधर्मिता को सोखने का गुण होता है । भोपाल में घातक गैस का रिसाव हुआ तो इसका असर उन घरों में कम हुआ, जो गोबर से लिपे हुए थे व जहाँ गाय के घी एवं कंडे से हवन होता था ।

भारतीय गोवंश का पंचगव्य निकट भविष्य में प्रमुख जैव-औषधि बनने की सीमा पर खड़ा है । अमेरिका ने पेटेंट देकर स्वीकार किया है कि कैंसर-नियंत्रण में गोमूत्र सहायक है ।

भारतीय गाय की पीठ पर, गलमाला पर प्रतिदिन आधा घंटा हाथ फेरने से रक्तचाप नियंत्रण में रहता है ।

गोबर को शरीर पर मलकर स्नान करने से बहुत-से चर्मरोग दूर हो जाते हैं गोमय-स्नान को पवित्रता और स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वोत्तम माना गया है । इस प्रकार भारतीय गाय की अनेक अद्भुत विशेषताएँ हैं । 

धनभागी हैं वे लोग, जिनको भारतीय गाय  का दूध, दूध के पदार्थ आदि मिलते हैं और जो उनकी कद्र करते हैं ।

~लोक कल्याण सेतु, अगस्त 2015

 

Madan Mohan Malviya Quotes Sayings for “Gau Rakshak” [Gau Seva]

Bharat Kalyan k liye Gau Raksha Anivarya

– पं. मदनमोहन मालवीयजी

आप जानते हैं कि भारत के कल्याण के लिए गौ-रक्षा अनिवार्य है । संसार का जो उपकार गौमाता ने किया है, उसके महत्व को जानते हुए भी लोग गौ की उपेक्षा करते हैं और गौ-रक्षा के प्रश्न पर ध्यान नहीं देते । यह उनका भ्रम (बेहोशी) और अन्याय है ।

जो लोग गोवध करते हैं अथवा गोवध करना अपना धर्म समझते हैं उनके अज्ञान का ठिकाना नहीं ।

गौ जैसे उपकारी प्राणी का वध करना कभी भी धर्मसंगत नहीं कहा जा सकता । दुःख की बात है कि जो लोग गौमाता को पूज्य दृष्टि से देखते हैं और उनकी पूजा कर वैतरणी* पार उतरना चाहते हैं, वे भी गौ-सेवा से विमुख दिखाई देते हैं ।

सब सज्जनों से मैं अनुरोध करता हूँ कि गौ-रक्षा के प्रश्न पर विशेष ध्यान दें और प्राणपण से इस बात की चेष्टा करें कि भारत में फिर वही दिन आ जाए जब गौ सचमुच में माता समझी जाए और उसकी रक्षा के लिए हम अपने प्राणों का मोह न करें ।

मुझे पूरा विश्वास है कि यदि आप ऐसा संकल्प कर लेंगे और गौ रक्षा के अनुष्ठान में तन-मन-धन से लग जायेंगे तो वे दिन दूर नहीं हैं, जब फिर से देश में दूध की नदियाँ बहें और प्रत्येक भारतीय गौमाता को पूज्य दृष्टि से देखे । याद रहे कि इस्लाम या कुरान शरीफ में गोवध का विधान नहीं है जो हमें उसके रोकने में मजहब की अड़चन पड़े । गौमाता की सभी संतान हैं ।

हिन्दू, मुसलमान या ईसाई का सवाल गौमाता के यहाँ नहीं है। अकबर को इस बात का ज्ञान था । उसने गोवध बंद करवा दिया था । सँभलो और औरों को समझाओ कि दिव्य जीवन के लिए गौ-सेवा कितने महत्त्व की चीज है ।

विश्वास रखो कि यदि आप गौ-पालन के लिए तैयार हो गये तो परमात्मा अवश्य आपकी मदद करेगा और आप जरूर अपने काम में सफल होंगे ।

*पुराणानुसार परलोक की एक नदी, जिसे जीवात्मा को शरीर छोड़ने पर पार करना पड़ता है ।

– लोक कल्याण सेतु / अक्टूबर 2018

 

 

Gau Mata Vardan Hai Manav Ke liye: Cow’s Milk, Dung, Khad Benefit

gau mata ka vardan

लक्ष्मीश्च गोमये नित्यं पवित्र सर्वमंगल्या | (स्कंद ,अव०,रेवा  ६३/१०८ )

अर्थात गोबर में परम पवित्र सर्व मंगलमयी श्री लक्ष्मी जी का नित्य निवास है , जिसका अर्थ यही है कि ‘गोबर में सारी धन -सम्पदा समायी हुई है|’ लाभ तो अनेक हैं, उसमें से कुछ उधृत इस प्रकार है |                   

➠ कृषिविकास में गोवंश का योगदान —

 प्राचीन काल से गोवंश हमारे देश की अर्थव्यवस्था में विशेष योगदान देता आ रहा है | गाय का हमारी संस्कृति से अतीत काल से सम्बन्ध है। इसे माता की संज्ञा इसलिए दी गयी है कि यह हमारे जीवन का केंद्र-बिंदु रही है। ठीक माँ जिस भांति बच्चों की देख-रेख, भरण-पोषण करती है, उसी भांति गाय हमारे विकास में भागीदार है। दूध और उससे बनी वस्तुओं के अतिरिक्त हमारे आर्थिक निर्माण में गोवंश की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान है।

गोशाला (dairy farm) से सर्वाधिक लाभ –

 कृषि के विकास में गोवंश का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है और भविष्य में रहेगा भी। इस सन्दर्भ में विगत वर्षों में किये गये शोध तथा परीक्षणों के आधार पर कई आंकड़े सामने आये हैं । पंजाब में किये गये शोध-कार्य ने स्पष्ट किया है कि डेरी-उद्योग किसान के दिये अन्न-उत्पादन की अपेक्षा अधिक लाभकर है। इसी दिशा में और अधिक गौ-वंश फार्मिंग में अधिक लाभ हुआ। आंकड़ों के अनुसार डेरी-उद्योग के अंतर्गत भी गौ-वंश पर आधारित फार्मिंग में प्रति रु. 100 की लगातार रु. 117 की आय हुई, जबकि भैंस-वंश-फार्मिंग में रु. 114 की आय हुई.।इससे स्पष्ट होता है कि यद्यपि भैंस भारतीय डेरी-उद्योग में प्रमुख ईकाई है तथापि गाय का योगदान किसान के लिये आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक है। यह हमारे लिये एक गर्व की बात है।

 गोबर से लाभ

गोबर मल नहीं है खाद है, जिसका मूल्य भारतीय किसान भली-भांति जानता है। कृषि-वैज्ञानिकों ने अन्वेषण करने के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला है कि गोबर के सेंद्रिय खाद के प्रयोग से भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ती है। एक गाय अथवा बैल के एक दिन के गोबर से लगभग रु. 40-50 की खाद तैयार होती है। उर्वरक के साथ-साथ गोबर-गैस संयंत्रों से ईंधन और प्रकाश की भी पूर्ति होती है तथा जनरेटर चलाकर बिजली भी उत्पन्न की जाती है। इस प्रकार निर्धन किसान को पूरे साल रोजगार देने और उसकी आमदनी में वृद्धि करने का श्रेय गोवंश को जाता है।

गोबर और गोमूत्र का समुचित उपयोग करने से जो आय होती है, उससे गाय-बैल के भरण-पोषण का खर्च निकालने के पश्चात् भी बचत ही रहेगी, ऐसी स्थिति में गाय का दूध और बैल का परिश्रम उसके पालकों को मुफ्त में प्राप्त होगा, जिससे उनके परिवारों में समृद्धि आयेगी।

➠ खाद की खर्चे से बचत  – गोबर में ऐसी क्षमता है कि यदि कूड़े-कचरे के ढेर पर गोबर घोल बनाकर डाला जाए तो वह कूड़ा-कचरा तीन-चार माह में उपयोगी खाद बन जाता है।  गोवर्धन केंद्र पुसद (यवतमाल) में इसका सफल प्रयोग करने से ज्ञात हुआ कि एक किलोग्राम गोबर से तीस किलोग्राम उपयोगी खाद तैयार हुई।

➠ बर्तनों की सफाई, करोड़ों रूपये की बचत – भारत के गांवों, कस्बों तथा शहरों में रहने वाले करोड़ों लोग भी अपने बर्तनों की सफाई गोबर की राख से करते हैं । यदि यह सफाई किसी क्लीनिंग-पाउडर से की जाए तो लाखों टन पावडर लगेगा, जिसका मूल्य करोड़ों रूपये होगा। गोबर की राख बिना मूल्य के लोगों को मिल जाती है और किसी प्रकार से हानिकारक भी नहीं है। यह अत्यंत पवित्र मानी जाती है।

➠ दुर्गन्ध नाशक केमिकल की खर्चे से बचत – गोबर के कंडों (उपलों) को ईंधन के रूप में जलाने के पश्चात् जो राख शेष रह जाती है, वह भी अपने में एक उत्कृष्ट मलशोधक है। गावों में जहां शौचालय नहीं है, वहां आज भी लोग मल की दुर्गन्ध समाप्त करने के लिये राख का छिड़काव करते हैं। छिड़काव होते ही मल की दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है और कालांतर में यह मल भी खाद के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

कीटनाशक के खर्चे से बचतगोबर की राख का उपयोग हमारे किसान भाई अपने खेतों में खाद और कीटनाशक के रूप में भी अनेक वर्षों से करते आये हैं। खेत में राख पड़ने से दीमक आदि कीड़े नहीं पनपते तथा फसल अच्छी होती है।

➠ गैसबिजली और खाद के खर्चे से बचतअरबों रूपये का उत्पादन- जहाँ पर गोबर की जिस मात्रा में उपलब्धता हो, उसी के अनुसार छोटे अथवा बड़े गोबर-गैस संयत्र लगाये जा सकते हैं। गोबर-गैस संयत्र से ईंधन के रूप में ही नहीं बल्कि बिजली उत्पादन में भी महत्वपूर्ण उपयोग है।

➠ दवाई के खर्चे की वचत – दूध, दही, घी, गोमूत्र तथा गोबर से विभिन्न रोगों के रोकथाम हेतु कई प्रकार की औषधियां भी बनाई जाती है। यह घरेलु और सस्ता है | इसके सेवन करने से शरीर, मन, बुद्धि और अंतःकरण के विकार समाप्त हो जाते हैं । साथ ही व्यक्ति इसके उपयोग करने से अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव  से बचेगा और उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।

प्रदूषण एवं आण्विक विकिरण से बचाव के लिये गोबर रक्षा-कवच है । हमारे देश में हजारों वर्षों से यज्ञ की वेदी तथा आवास-गृह गोबर एवं पीली मिट्टी से लीपने की परंपरा रही है। गोबर के लीपने से सभी हानिकारक कीटाणु-विषाणु नष्ट हो जाते हैं । वायु-प्रदूषण एवं आणविक विकिरण से रक्षा होती है.

➠ भारत की गाय केवल दुधारू नहीं है। अपितु यह लौकिक और पारलौकिक सारी कामनाएं पूरी करनेवाली कामधेनु हैं इससे लाखों परिवारों का पालनपोषण होता है