लक्ष्मीश्च गोमये नित्यं पवित्र सर्वमंगल्या | (स्कंद ,अव०,रेवा  ६३/१०८ )

अर्थात गोबर में परम पवित्र सर्व मंगलमयी श्री लक्ष्मी जी का नित्य निवास है , जिसका अर्थ यही है कि ‘गोबर में सारी धन -सम्पदा समायी हुई है|’ लाभ तो अनेक हैं, उसमें से कुछ उधृत इस प्रकार है |                   

➠ कृषिविकास में गोवंश का योगदान —

 प्राचीन काल से गोवंश हमारे देश की अर्थव्यवस्था में विशेष योगदान देता आ रहा है | गाय का हमारी संस्कृति से अतीत काल से सम्बन्ध है। इसे माता की संज्ञा इसलिए दी गयी है कि यह हमारे जीवन का केंद्र-बिंदु रही है। ठीक माँ जिस भांति बच्चों की देख-रेख, भरण-पोषण करती है, उसी भांति गाय हमारे विकास में भागीदार है। दूध और उससे बनी वस्तुओं के अतिरिक्त हमारे आर्थिक निर्माण में गोवंश की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान है।

गोशाला (dairy farm) से सर्वाधिक लाभ –

 कृषि के विकास में गोवंश का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है और भविष्य में रहेगा भी। इस सन्दर्भ में विगत वर्षों में किये गये शोध तथा परीक्षणों के आधार पर कई आंकड़े सामने आये हैं । पंजाब में किये गये शोध-कार्य ने स्पष्ट किया है कि डेरी-उद्योग किसान के दिये अन्न-उत्पादन की अपेक्षा अधिक लाभकर है। इसी दिशा में और अधिक गौ-वंश फार्मिंग में अधिक लाभ हुआ। आंकड़ों के अनुसार डेरी-उद्योग के अंतर्गत भी गौ-वंश पर आधारित फार्मिंग में प्रति रु. 100 की लगातार रु. 117 की आय हुई, जबकि भैंस-वंश-फार्मिंग में रु. 114 की आय हुई.।इससे स्पष्ट होता है कि यद्यपि भैंस भारतीय डेरी-उद्योग में प्रमुख ईकाई है तथापि गाय का योगदान किसान के लिये आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक है। यह हमारे लिये एक गर्व की बात है।

 गोबर से लाभ

गोबर मल नहीं है खाद है, जिसका मूल्य भारतीय किसान भली-भांति जानता है। कृषि-वैज्ञानिकों ने अन्वेषण करने के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला है कि गोबर के सेंद्रिय खाद के प्रयोग से भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ती है। एक गाय अथवा बैल के एक दिन के गोबर से लगभग रु. 40-50 की खाद तैयार होती है। उर्वरक के साथ-साथ गोबर-गैस संयंत्रों से ईंधन और प्रकाश की भी पूर्ति होती है तथा जनरेटर चलाकर बिजली भी उत्पन्न की जाती है। इस प्रकार निर्धन किसान को पूरे साल रोजगार देने और उसकी आमदनी में वृद्धि करने का श्रेय गोवंश को जाता है।

गोबर और गोमूत्र का समुचित उपयोग करने से जो आय होती है, उससे गाय-बैल के भरण-पोषण का खर्च निकालने के पश्चात् भी बचत ही रहेगी, ऐसी स्थिति में गाय का दूध और बैल का परिश्रम उसके पालकों को मुफ्त में प्राप्त होगा, जिससे उनके परिवारों में समृद्धि आयेगी।

➠ खाद की खर्चे से बचत  – गोबर में ऐसी क्षमता है कि यदि कूड़े-कचरे के ढेर पर गोबर घोल बनाकर डाला जाए तो वह कूड़ा-कचरा तीन-चार माह में उपयोगी खाद बन जाता है।  गोवर्धन केंद्र पुसद (यवतमाल) में इसका सफल प्रयोग करने से ज्ञात हुआ कि एक किलोग्राम गोबर से तीस किलोग्राम उपयोगी खाद तैयार हुई।

➠ बर्तनों की सफाई, करोड़ों रूपये की बचत – भारत के गांवों, कस्बों तथा शहरों में रहने वाले करोड़ों लोग भी अपने बर्तनों की सफाई गोबर की राख से करते हैं । यदि यह सफाई किसी क्लीनिंग-पाउडर से की जाए तो लाखों टन पावडर लगेगा, जिसका मूल्य करोड़ों रूपये होगा। गोबर की राख बिना मूल्य के लोगों को मिल जाती है और किसी प्रकार से हानिकारक भी नहीं है। यह अत्यंत पवित्र मानी जाती है।

➠ दुर्गन्ध नाशक केमिकल की खर्चे से बचत – गोबर के कंडों (उपलों) को ईंधन के रूप में जलाने के पश्चात् जो राख शेष रह जाती है, वह भी अपने में एक उत्कृष्ट मलशोधक है। गावों में जहां शौचालय नहीं है, वहां आज भी लोग मल की दुर्गन्ध समाप्त करने के लिये राख का छिड़काव करते हैं। छिड़काव होते ही मल की दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है और कालांतर में यह मल भी खाद के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

कीटनाशक के खर्चे से बचतगोबर की राख का उपयोग हमारे किसान भाई अपने खेतों में खाद और कीटनाशक के रूप में भी अनेक वर्षों से करते आये हैं। खेत में राख पड़ने से दीमक आदि कीड़े नहीं पनपते तथा फसल अच्छी होती है।

➠ गैसबिजली और खाद के खर्चे से बचतअरबों रूपये का उत्पादन- जहाँ पर गोबर की जिस मात्रा में उपलब्धता हो, उसी के अनुसार छोटे अथवा बड़े गोबर-गैस संयत्र लगाये जा सकते हैं। गोबर-गैस संयत्र से ईंधन के रूप में ही नहीं बल्कि बिजली उत्पादन में भी महत्वपूर्ण उपयोग है।

➠ दवाई के खर्चे की वचत – दूध, दही, घी, गोमूत्र तथा गोबर से विभिन्न रोगों के रोकथाम हेतु कई प्रकार की औषधियां भी बनाई जाती है। यह घरेलु और सस्ता है | इसके सेवन करने से शरीर, मन, बुद्धि और अंतःकरण के विकार समाप्त हो जाते हैं । साथ ही व्यक्ति इसके उपयोग करने से अंग्रेजी दवाइयों के दुष्प्रभाव  से बचेगा और उसे अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।

प्रदूषण एवं आण्विक विकिरण से बचाव के लिये गोबर रक्षा-कवच है । हमारे देश में हजारों वर्षों से यज्ञ की वेदी तथा आवास-गृह गोबर एवं पीली मिट्टी से लीपने की परंपरा रही है। गोबर के लीपने से सभी हानिकारक कीटाणु-विषाणु नष्ट हो जाते हैं । वायु-प्रदूषण एवं आणविक विकिरण से रक्षा होती है.

➠ भारत की गाय केवल दुधारू नहीं है। अपितु यह लौकिक और पारलौकिक सारी कामनाएं पूरी करनेवाली कामधेनु हैं इससे लाखों परिवारों का पालनपोषण होता है