भारत में गौहत्या विशेषकर अंग्रेजों का शासन स्थापित होने पर शुरू हुई । यहाँ पहले गौहत्या न के बराबर ही होती थी लेकिन अंग्रेजों ने इसे बढ़ावा दिया । भारत में स्वतंत्रता के बीज का अंकुरण गौ के कारण ही हुआ ।

1857 ई. में जब अंग्रेज सरकार ने कारतूसों में गाय की चरबी का प्रयोग शुरू किया तो गौभक्त भारतीय सिपाही यह सहन न कर पाये कि विदेशी विधर्मी अंग्रेज सरकार गाय की चर्बी के माध्यम से पवित्र वैदिक धर्म नष्ट करे ।

वीर मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी (मेरठ) में गाय की चरबी लगे अपवित्र कारतूसों को छूने से इनकार करके खुला विद्रोह किया । इस विद्रोह के परिणाम स्वरूप भारत में प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हुआ ।

झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई केवल स्वतंत्रता ही नहीं बल्कि गौरक्षा के लिए भी आजादी की लड़ाई में कूदी थीं और अंग्रेजी सैनिकों से लोहा लिया था ।

अंग्रेजों ने गोरी फौज का पेट भरने के लिए हिन्दुओं के पवित्र तीर्थस्थानी में गौओं को काटना प्रारम्भ कर दिया था । इससे अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा और असंतोष उत्पन्न होना स्वाभाविक था ।

1857 की क्रांति के बाद स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपत राय, हासानंद, पं. मदनमोहन मालवीयजी, लोकमान्य तिलक, चौधरी चरण सिंह आदि ने स्वतंत्रता आंदोलन को सक्रिय हुआ  था। इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वाधीन भारत में गौहत्या का कलंक पूरी तरह मिटाने का संकल्प लिया था । कई गौभक्तों ने बलिदान भी दिया । 

सन् 1921 के पावन गोपाष्टमी पर्व पर दिल्ली के ‘शहीदी हॉल’ में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता और महात्मा गांधी की उपस्थिति में एक सम्मेलन हुआ । उसमें सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि ‘अंग्रेजी राज्य में गौहत्या होती है अतः इस राज्य को सहयोग नहीं किया जाए ।’

 

पं. मदनमोहन मालवीयजी ने जनवरी 1928 में प्रयाग में त्रिवेणी के पावन तट पर ‘अखिल भारतीय सनातन धर्म महासभा’ के अधिवेशन में हाथ में गंगाजल लेकर प्रतिज्ञा की थी कि स्वतंत्र भारत का जो संविधान बनेगा. उसके प्रथम परिच्छेद में ही गौ हत्या बंदी की कलम होगी ।

गौहत्या बड़ा-से-बड़ा महापाप है । गौवंश की रक्षा में ही देश की रक्षा समायी है । हम जीवनभर गौरक्षा तथा गौसेवा के लिए प्रयासरत रहेंगे ।

गांधीजी कहते थे : “मानव-विकास के इतिहास में गौरक्षा को मैं एक महत्त्वपूर्ण घटना मानता हूँ । मैं तो गौरक्षा को स्वराज्य से भी अधिक महत्व का प्रश्न मानता हूँ ।”

स्वामी श्रद्धानंद कहते थे : “गौमाता सब सुख-सम्पत्ति की दात्री है इसलिए इसकी रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए ।”

– लोक कल्याण सेतु / नवम्बर 2017