‘श्रीमद् देवी भागवत’ के नवम स्कंध में आता है कि एक बार मुनिवर दुर्वासा जी वैकुंठ से कैलाश शिखर पर जा रहे थे । इन्द्र ने देखा तो मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया । उनके शिष्यों को भी भक्तिपूर्वक प्रसन्नता के साथ इन्द्र ने संतुष्ट किया ।

तब शिष्यों सहित मुनिवर दुर्वासा ने इन्द्र को आशीर्वाद दिया, साथ ही भगवान विष्णु द्वारा प्राप्त मनोहर पारिजात पुष्प भी उन्हें दिया ।

राज्यश्री के गर्व से गर्वित इन्द्र ने मोक्षदायी उस पुष्प को अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया । उस पुष्प का स्पर्श होते ही रूप, गुण, तेज व अवस्था इन सबसे सम्पन्न होकर ऐरावत भगवान विष्णु के समान हो गया । फिर तो इन्द्र को छोड़कर वह घोर वन में चला गया । उस समय इन्द्र तेज से युक्त उस ऐरावत पर शासन नहीं कर सके ।

इन्द्र ने उस दिव्य पुष्प का परित्याग कर तिरस्कार किया है यह जानकर मुनिवर दुर्वासा के रोष की सीमा न रही । उन्होंने क्रोधावेश में शाप देते हुए कहा : “अरे ! मैंने तुम्हें भगवान के प्रसादरूप यह पारिजात पुष्प दिया, गर्व के कारण तुमने स्वयं इसका उपयोग न करके हाथी के मस्तक पर रख दिया । नियम तो यह है कि श्री विष्णु को समर्पित किये हुए नैवेद्य, फल अथवा जल के प्राप्त होते ही उसका उपभोग करना चाहिए । सौभाग्यवश प्राप्त हुए भगवान के नैवेद्य का जो त्याग करता है, वह पुरुष श्री और बुद्धि से भ्रष्ट हो जाता है । इन्द्र ! तुमने जो यह अपराध किया है उसके फलस्वरूप लक्ष्मी तुम्हें छोड़कर भगवान श्रीहरि के समीप चली जाए ।”

तत्पश्चात् देवराज इन्द्र ने देखा कि उनकी अमरावती पुरी दैत्यों और असुरों से भली भांति भरी हुई है। ऐसी स्थिति में वे गुरुदेव बृहस्पति जी के पास चले गये और उनके चरणकमलों में मस्तक झुकाकर उच्च स्वर से रोने लगे ।

तदनंतर गुरु बृहस्पति जी के उपदेश से भगवान नारायण का ध्यान करके देवराज इन्द्र ब्रह्मा सहित सम्पूर्ण देवताओं को साथ ले कर बैकुंठ पधार गयें । आँखों में आँसू भरकर समस्त देवतागण परम प्रभु भगवान श्रीहरि की स्तुति करने लगे ।

देवताओं को दीन दशा में पड़े हुए देखकर भगवान श्रीहरि ने उनसे कहा: “देवताओं ! भय मत करो । मैं तुम्हें परम ऐश्वर्य बढ़ाने वाली अचल लक्ष्मी प्रदान करूंगा परंतु मैं कुछ संबंधित बात कहता हूँ , उस पर तुम लोग ध्यान दो ।”

सदा मेरे भजन-चिंतन में लगा रहने वाला निरंकुश भक्त जिस पर रूष्ट हो जाता है, उसके घर लक्ष्मी सहित मैं नहीं ठहर सकता – यह बिल्कुल निश्चित है । जिस स्थान पर मेरे भक्तों की निंदा होती है वहाँ रहने वाली महालक्ष्मी के मन में अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है । अतः वे उस स्थान को छोड़कर चल देती हैं ।

जो मेरी उपासना नहीं करता तथा एकादशी और जन्माष्टमी के दिन अन्न खाता है, उस मूर्ख व्यक्ति के घर से भी लक्ष्मी चली जाती हैं । जो कायर व्यक्तियों का अन्न खाता है, निष्प्रयोजन तृण तोड़ता है, पैरों से पृथ्वी को कुरेदता रहता है, जो निराशावादी है, सूर्योदय के समय भोजन करता है, दिन में सोता और मैथुन करता है और जो सदाचारहीन है, ऐसे मूर्खों के घर से मेरी प्रिया लक्ष्मी चली जाती है ।

जहाँ भगवान श्रीहरि की चर्चा होती है और उनके गुणों का कीर्तन होता है, वहीं पर सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल प्रदान करने वाली भगवती लक्ष्मी निवास करती हैं ।

जहाँ शंख ध्वनि होती है तथा शंख, शालीग्राम, तुलसी इनका निवास रहता है एवं उनकी सेवा, वंदना व ध्यान होता है वहाँ लक्ष्मी सदा विद्यमान रहती हैं । जहाँ सदाचारी ब्राह्मणों की सेवा व सम्पूर्ण देवताओं का अर्चन होता है, वहाँ पद्ममुखी साध्वी लक्ष्मी विराजती हैं ।”

तदनंतर महालक्ष्मी की कृपा से देवताओं ने दुर्वासा मुनि के शाप से मुक्त होकर दैत्यों के हाथ में गये हुए अपने राज्य को प्राप्त कर लिया ।

पूज्य बापूजी कहते हैं : “सफलता साधनों में नहीं अपितु सत्व में निवास करती है । जो छल-कपट व स्वार्थ का आश्रय लेकर, दूसरों का शोषण करके सुखी होना चाहते हैं उनके पास वित्त, धन आ सकता है परंतु लक्ष्मी नहीं आ सकती । जो लोग जप-ध्यान-प्राणायाम करते हैं, आय का कुछ हिस्सा दान करते हैं, शास्त्र के ऊँचे लक्ष्य को समझने के लिए महापुरुषों का सत्संग आदर सहित सुनते हैं उनका भविष्य मोक्षदायक है । वे समझदार, श्रद्धावान, प्रभुप्रेमी मनुष्य भगवद्सुख, भगवद्ज्ञान, भगवद्रस से सम्पन्न मोक्षदा मति के धनी हो जाते हैं । अपनी सात-सात पीढ़ियों के तारणहार बन जाते हैं । धन्य हैं वे श्रद्धावान !”

📚 ऋषि प्रसाद- अक्टूबर २००८