एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा ?

निर्णय लेने के लिए दोनों गय़े शिव-पार्वती के पास । शिव – पार्वती ने कहा : जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा ।

कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने । गणपति जी चुपके से एकांत में चले गये । थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया । जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं । अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा ।

फिर गणपति जी आये शिव – पार्वती के पास । माता – पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे । एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता – पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली ।

शिव – पार्वती ने पूछा : वत्स ! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की ?

गणपतिजी बोले : सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमयो पिता… सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से हो जाता है, यह शास्त्रवचन है । पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है । पिता देवस्वरूप हैं । अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं । तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये ।

शिव – पुराण में आता है :

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः ।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम् ।।

“जो पुत्र माता – पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है ।”