ब्रह्मज्ञानी महापुरुष संसाररूपी मरुस्थल में त्रिविध तापों से तप्त मानव के लिए विद्या विशाल वटवृक्ष हैं, गंगा का शीतल जीवनदायी प्रवाह हैं । यद्यपि ईश्वर-शास्त्र अनुगामी भक्त संतों के चरित्र तो शुरू से अंत तक अमृतोपम होते हैं, तथापि उनके जीवन की कई घटनाएँ तो रसप्रद, सत्प्रेरणाप्रद होती हैं कि जिनको एक ही बार पढ़-सुन लेने से जीवन में महान परिवर्तन होता है और यदि वे ठीक से जीवन में उतर गयीं तो फिर जीवन के लिए अमिट, शाश्वत वरदान सिद्ध होती है । बड़े-बड़े अपराधी भी संतों के जीवन-चरित्र पढ़-सुनकर साधु स्वभाव हो गये, पापी पुण्य आत्मा हो गये, दुर्जन सज्जन बन गये और सज्जन सत्पद को प्राप्त कर मुक्त हो गये ।

ब्रह्मनिष्ठ पूज्य संत श्री आशारामजी बापू ने अपने सद्गुरुदेव साँई श्री लीलाशाहजी महाराज के कृपा-प्रसाद से 23 वर्ष की अल्प आयु में ही आत्मज्ञान का वह पूर्ण खजाना पा लिया था, जिसके आगे त्रिलोकी के समग्र सुख-वैभव तुच्छ हो जाते हैं । पूज्य बापूजी के बाल्यकाल में घटित दैवी घटनाएँ, वाक्सिद्धि एवं ऋद्धि-सिद्धियों का प्राकट्य, पराकाष्टा का वैराग्य, भगवत्प्राप्ति तीव्रतम लालसा, विवाह के बाद भी जल-कमलवत् जीवन, सद्गुरु आज्ञा-पालन की दृढ़ता, जीवन का हर एक प्रसंग बड़ा ही रोचक व प्रेरणाप्रद है । इसी अमृतसागर की सारस्वरूप सुंदर पद्य-रचना अर्थात् गागर में सागर समाने का भगीरथ प्रयास है ‘श्री आशारामायणजी’ ।

इसके पठन-श्रवण से चंचल चित्त में एकाग्रता, संतप्त हृदय में आत्मिक शीतलता तथा निष्कामता, भगवद्रस, संयम-सदाचार एवं भक्तिरस का भगवद्-लाभ सहज में मिलने लगता है । इस पतितपावनी, त्रिभुवन तारिणी गाथा में कर्मयोग, भक्तियोग एवं ज्ञानयोग की ऐसी त्रिवेणी प्रवाहित होती है, जो मनुष्यमात्र को पावन बनाकर उसके जीवन को जीवनदाता के रस की तरफ, अपने असली ‘मैं’ की तरफ मोड़ देती है, परम लक्ष्य की ओर मोड़ देती है । निज आत्मलाभ की उमंग जगाकर जीव में से शिव, मानव में से महेश्वर के प्राकट्य का अवसर प्रदान करती है । 

आप सद्गुरु से निभाना चाहते हैं तो ‘श्री आशारामायणजी’ आपके लिए माला की मेरुमणि हैं । प्रेम से गाइये और शांत होते जाइये, दिल से पुकारिये और तन्मय होते जाइये । जब ईश्वरप्राप्त महापुरुष धरती पर विद्यमान हों और उनके जीवन-चरित्र द्वारा उनकी अनंत महानता का एक कण हमारी मति में प्रवेश कर जाय तो भी ईश्वरप्राप्ति के लिए उमंग , उत्साह व आत्मविश्वास अनंत गुना बढ़ जाता है । श्री आशारामायण जी का पाठ करने से बालक, वृद्ध, नर-नारी सभी प्रेरणा पाते हैं । इसके पाठ से मनोकामना की पूर्ति तो होती ही है, साथ ही बिन माँगे परमानंदस्वरूप परम पद के प्रति प्रीति हो जाती है । इच्छापूर्ति के चाहकों के लिए और इच्छानिवृत्ति के द्वारा आत्मज्ञान के जिज्ञासुओं के लिए समान रूप से उपयोगी यह गाथा अत्यंत आश्चर्यकारक है । यही है इन करुणा-अवतार की प्रकट अहैतु की कृपा !

श्री आशारामायणजी के पाठ से लाखों लोगों को जो जागतिक उपलब्धियाँ व दिव्य आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई हैं, वे वाणी में नहीं आ सकती हैं । शब्द वहाँ बौने हो जाते हैं, लेखनी वहाँ रुक जाती है । फिर भी चंद लोगों के अनुभवों को यहाँ शब्दों में उतारने का एक अल्प प्रयास किया गया है :

पठानकोट के विनय शर्मा कहते हैं : “मैं ‘कौन बनेगा करोड़पति’ शो में ‘हॉट सीट’ के लिए चुना गया । घर पर माँ श्री आशारामायणजी के 108 पाठ कर रही थी । 108 पाठ पूरे होते ही मैं 25 लाख रुपये जीत चुका था और हम पर अभिनंदन की वर्षा होने लगी ।” 

‘राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ व ‘नाट्य गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित, मंगोलिया में बच्चों के अंतर्राष्ट्रीय शिविर में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली, देश विदेश में जादू के 7000 शो करने वाली तथा कई टीवी चैनलों के टैलेंट एवं रियालिटी शो में भाग ले चुकी बालिका जादूगर आँचल कहती हैं : “मैं श्री आशारामायणजी का पाठ करती हूँ । मैंने जो अनेक इनाम व पदक हासिल किये हैं, वे सारी उपलब्धियाँ तथा योग्यताएँ केवल पूज्य बापूजी के आशीर्वाद की ही देन हैं ।”

चंडीगढ़ की महिमा दुग्गल कहती हैं : “पहले मेरे मुश्किल से 60-65 प्रतिशत अंक आ पाते थे लेकिन दीक्षा लेने के बाद मंत्रजप और श्री आशारामायणजी के पाठ से मेरी स्मृतिशक्ति और बुद्धिशक्ति में विलक्षण वृद्धि हुई और इससे 10 वीं की परीक्षा में 95% अंक (CGPA 10) तथा 2014 में 12 वीं की परीक्षा में 97.2% अंक पाकर मैंने चंडीगढ़, पंचकुला, मोहाली आदि क्षेत्रों में चौथा स्थान प्राप्त किया ।”

15 फरवरी 2015 को पूज्य बापूजी ने कहा था :

श्री आशारामायण के पाठ में आता है –

एक सौ आठ जो पाठ करेंगे,

उनके सारे काज सरेंगे ।

दाहोद-इंदौर के बीच स्थित अमझेरा गाँव में जब भी बारिश की तंगी होती है, तब 108 पाठ पूरे होने के पहले ही बारिश हो जाती है । हजारों किसानों का कई बार का अनुभव है । किसान बारिश कराते हैं तो अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने में तुम्हारे बाप का क्या जाता है ? (सभाखंड में हास्य) बापू के बच्चे, नहीं रहते कच्चे !… है न याद ? शाबाश ! ॐ ॐ ॐ… हाऽ हाऽ हाऽ… ” 

जिसने जिस संकल्प से इसका पाठ किया, उसे उस लाभ की प्राप्ति हुई है । तो क्या साधक दृढ़ संकल्प करके श्री आशारामायणजी के अनुष्ठान द्वारा अपने भक्तवत्सल, परम दयालु सद्गुरुदेव को स्थायी रूप से कारागृह से बाहर आने हेतु नहीं रिझा सकते ? अवश्य रिझा सकते हैं ! हरि ॐ… ॐ… ॐ…

श्री आशारामायणजी के पाठ के लिए विशेष विधि-विधान की आवश्यकता नहीं है । आश्रम, एकांत स्थान, घर अथवा यथानुकूल किसी स्थान पर इसका पाठ कर सकते हैं । वास्तव में ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष के जीवन-चरित्र की महिमा एवं उसमें छुपे रस का वर्णन लेखनी के शब्दों में समा नहीं सकता है । उन्हें तो बस पाठ करके अनुभव ही किया जा सकता है । यह तो ऐसा अमृत है कि इसका जो एक बार पान कर लेता है, वह उसे पीता ही जाता है, गुण गाता ही जाता है । इस दिव्य, शीतल अमृत-सरिता में गोते लगायें, जन्म जन्मांतरों की थकान मिटायें, सद्गुरु-सान्निध्य को शीघ्र पायें और अपने परम लक्ष्य परमानंदस्वरूप में जाग जायें ।

लक्ष्य की तरफ ले जानेवाली छंदोबद्ध जीवनगाथा – श्री आशारामायणजी

प्रश्न : गुरुदेव ! श्री आशारामायण जी के 108 पाठ जल्दी-जल्दी करना ठीक है या पाठ अच्छे-से करना उचित होगा ?”

पूज्य बापूजी : “आशारामायण का पाठ शांति से भी कर सकते हैं और विश्रांति पाएं तो वह लाभ देता है लेकिन एक सौ आठ जो पाठ करेंगे, उनके सारे काज सरेंगे ।

किसी कार्य की सिद्धि करनी हो और यह विश्वास पक्का हो तो जल्दी-जल्दी करना भी ठीक ही है ।

आशारामायण के एक-एक वाक्य आप लोगों के लिए उत्साहवर्धक हैं। इसमें लक्ष्य की तरफ पहुँचानेवाली बात है, फालतू बात नहीं।

आशारामायण का पाठ भगवन्नाम के साथ करने से हजार गुना फलदायी हो जाता है इसीलिए पाठ में हरि ॐ, हरि ॐ… बोलते हैं ।”

➢ ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2015