एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि कौन बड़ा …. ???

निर्णय लेने के लिए दोनों गय़े शिव-पार्वती के पास !!

शिव-पार्वती ने कहा :- ” जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा । “

कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने ……

गणपति जी चुपके से एकांत में चले गये । थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया ।

जो ध्यान करते हैं… शांत बैठते हैं… उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं । अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा ।

फिर गणपति जी आये शिव-पार्वती के पास । माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे । एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली ।

शिव-पार्वती ने पूछा :- वत्स ! ये प्रदक्षिणाएँ क्यों की ???

गणपति जी :- ” सर्वतीर्थमयी माता… सर्वदेवमय पिता… सारी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने से जो पुण्य होता है, वही पुण्य माता की प्रदक्षिणा करने से मिल जाता है…… यह शास्त्र वचन है । पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है । पिता देवस्वरूप हैं । अतः आपकी परिक्रमा करके मैंने संपूर्ण पृथ्वी की सात परिक्रमाएँ कर लीं हैं । “

तब से गणपति जी प्रथम पूज्य हो गये !!

शिव-पुराण में आता है ~

पित्रोश्च पूजनं कृत्वा प्रक्रान्तिं च करोति यः। तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।

अर्थात् जो पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी प्रदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी-परिक्रमाजनित फल सुलभ हो जाता है । “

प्रेम दिवस जरूर मनायें लेकिन प्रेम दिवस में संयम और सच्चा विकास लाना चाहिए ।  – पूज्य बापू जी

 

पूजन की विधि :-

पूजन कराने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे विधि बोलता जाये और निम्नलिखित मंत्रों एवं आरती का मधुर स्वर में गायन करता जाये । तदनुसार बच्चे और माता-पिता पूजन को सम्पन्न करेंगे।

माता-पिता को स्वच्छ तथा ऊँचे आसन पर बिठायें।

आसने स्थापिते ह्यत्र पूजार्थं भवरोरिह ।

भवन्तौ संस्थितौ तातौ पूर्यतां मे मनोरथः ।।

अर्थात् ʹ हे मेरे माता पिता ! आपके पूजन के लिए यह आसन मैंने स्थापित किया है । इसे आप ग्रहण करें और मेरा मनोरथ पूर्ण करें । ʹ

बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता के माथे पर कुमकुम का तिलक करें । तत्पश्चात् माता-पिता के सिर पर पुष्प एवं अक्षत रखें तथा फूलमाला पहनायें । अब माता-पिता की सात परिक्रमा करें । इससे उऩ्हें पृथ्वी परिक्रमा का फल प्राप्त होता है ।

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च ।

तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ।।

पुस्तक में दिये चित्र अऩुसार बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता को झुककर विधिवत् प्रणाम करें ।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः ।

चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।।

अर्थात् जो माता पिता और गुरुजनों को प्रणाम करता है और उऩकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं । ( मनुस्मृतिः 2.121 )

बच्चे-बच्चियाँ थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की आरती करें और अपने माता-पिता एवं गुरु में ईश्वरीय भाव जगाते हुए उनकी सेवा करने का दृढ़ संकल्प करें ।

दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः ।

दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोઽस्तु ते ।।