जो देशवासियों को शोषित करके परदेश में धन जमा करते हैं, ऐसे लोग इस प्रसंग को पढ़कर अपने को उन्नत बनाने के रास्ते लगेंगे तो कितना अच्छा….. !

संस्कृत के महाकवियों में कवि माघ का स्थान बड़ा ऊँचा है । वे धनी तो थे ही, साथ ही दानी भी थे । लोगों को यह विश्वास हो गया था कि ‘उनके घर से कोई भी खाली हाथ नहीं जाता’…. उनकी परोपकारिता इतनी प्रसिद्ध थी । दान देते-देते एक बार ऐसा समय भी आ गया कि वे निर्धन हो गये ।

एक रात किसी गरीब ब्राह्मण ने उनका दरवाजा खटखटाया । कविवर ने दरवाजा खोला तो उस व्यक्ति ने बड़े धीमे स्वर में उनसे बाहर आने के लिए कहा । वे बाहर आये तब उस व्यक्ति ने कहा : ‘‘मेरी बेटी की शादी है । कैसे कर पाऊँगा ? इसकी बड़ी चिंता है । मैं आपसे कुछ माँगने आया हूँ ।” कवि माघ की आर्थिक स्थिति उस वक्त ठीक नहीं थी । उन्होंने सोचा कि ‘इस वक्त न घर में धन है, न ही कोई ऐसी वस्तु है जो इनको दी जा सके ।’ कुछ देर तक सोचने के बाद वे अपनी सोयी हुई पत्नी के पास गये और धीरे से उसका हाथ उठाकर हाथ से कंगन उतारा । पत्नी की नींद खुल गयी परंतु अपने पति को सामने देखकर उसने आँखें बंद कर ली ।

कविवर ने बाहर आकर वह कंगन उस व्यक्ति को दे दिया और कहा : ‘‘जल्दी-जल्दी यहाँ से चला जा ।”

किंतु पत्नी ने दरवाजे की दरार में से देख लिया कि कविवर किसको वह कंगन दे रहे हैं ।

उस व्यक्ति ने कवि से कहा : ‘‘इस एक कंगन से मेरी बेटी की शादी नहीं हो पायेगी ।”

कवि : ‘‘अभी तुम एक ही ले जाओ, दूसरा मैं नहीं दे सकता ।”

पत्नी ने तुरंत दूसरा कंगन उतारा और बाहर आकर अपने पतिदेव को देते हुए कहा : ‘‘आप मुझसे क्यों छुपा रहे थे ? जरूरतमंदों की मदद के लिए ही हमारा जीवन है । इस व्यक्ति को दूसरे कंगन की भी जरूरत है, अतः आप इसे यह भी दे दीजिये ।”

अपनी पत्नी के इस व्यवहार से कवि बड़े प्रसन्न हुए और दूसरा कंगन भी ब्राह्मण को देकर उसे प्रसन्नतापूर्वक विदा किया ।

कवि माघ के जीवन की अन्य एक घटना है : ~

मालवा के राजा भोज अपना नित्य-नियम निपटाकर अकाल पीड़ितों को दान-दक्षिणादि देने जा रहे थे । इतने में उन्हें कवि माघ की धर्मपत्नी दिखाई दी । उनकी गरीबी भाँपकर राजा ने उनसे कहा : ‘‘कवि माघ हमारे राज्य का भूषण हैं । उनके घर में इतनी गरीबी ? देवी ! कविवर एवं आपकी आजीविका के लिए मैं अभी धन की व्यवस्था करता हूँ ।”

राजा ने तुरंत एक लाख अशर्फियाँ राजकोष से निकलवायीं और अपने दो सेवकों के हाथों में थमाकर उन्हें कविवर की पत्नी के साथ भेजा । कवि पत्नी घर की ओर लौटने लगीं तो रास्ते में उन्हें अकाल-पीड़ितों की टोली मिली । उनको भूख-प्यास से व्याकुल देखकर कविपत्नी से रहा न गया। उन्होंने अकाल-पीड़ितों को एक-एक अशर्फी देनी शुरू की । इस तरह थोड़ी ही देर में सब अशर्फियाँ खत्म हो गयीं । कवि पत्नी खाली हाथ घर लौट आयीं । घर आकर उन्होंने पति को सारी घटना सुना दी । कवि की आँखों से अश्रुधाराएँ बह चलीं।

पत्नी ने कहा : ‘‘क्या मैंने अशर्फियाँ अकालग्रस्तों में बाँटकर गलती की ?”

तब भारत का वह महामानव कहता है : ‘‘नहीं, नहीं । तूने अशर्फियाँ गरीबों में बाँट दीं इस बात के ये आँसू नहीं हैं, वरन् मेरे पास भी कुछ अशर्फियाँ होतीं तो उन्हें भी तुझे देकर कहता कि ‘ले जा, इन्हें भी दे आ । अब इस हाड़-माँस के पिंजर के अलावा मेरे पास और कुछ बचा नहीं है । ये आँसू इस बात के हैं कि अधिकारी सामने है किंतु हमारे पास देने के लिए कुछ नहीं है ।”

इस भारतभूमि पर ऐसे अनेक नामी-अनामी दानवीर हुए हैं, जिन्होंने अपनी सुख-सुविधा व स्वार्थ को तिलांजलि देकर परोपकार में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया । धन्य है भारतभूमि ! धन्य हैं ऐसी परहितपरायण महान आत्माएँ ! जो देशवासियों को शोषित करके परदेश में धन जमा करते हैं, ऐसे लोग इस प्रसंग को पढ़कर अपने को उन्नत बनाने के रास्ते लगेंगे तो कितना अच्छा !


-सीख
कवि माघ की नाईं सब लोग दानवीर बन जायें यह संभव नहीं है, परंतु यथायोग्य साधना और सत्कर्म तो सभी कर सकते हैं ।