मैं सात साल के आसपास का था तब की बात है। होली के दिन माँ ने एक मोटी रोटी बनायी, जिसको रोट बोलते हैं। उस पर से बायें और ऊपर से नीचे धागा लपेटा ।
कहा कि “इसको होली में डालेंगे, रोटी तो सिंक जायेगी, पक जायेगी, काली हो जायेगी लेकिन धागा सफेद रहेगा, जलेगा नहीं।”

मैंने कहा : “धागा जलेगा नहीं यह कैसे ? जब तुम रोटी निकालो तब मुझे बुलाना।”
उत्कंठा थी।
होली जल गयी, गोबर के कंडे थे, लकड़ियाँ थीं, सब जल गये। मेरे सामने माँ ने चिमटे से रोटी निकाली। देखा तो रोटी सिंककर एकदम काली-कलूट हो गयी थी पर धागा सफेद-का-सफेद !

माँ बोली : “जैसे प्रह्लाद की भक्ति से उसको अग्नि की आँच नहीं आयी, ऐसे ही इस धागे को आँच नहीं आयी । होलिका को तो वरदान था लेकिन भक्त के विरोध में उसका वरदान भी विफल हो गया और वह जल के मर गयी।”

होली का यह संदेश है कि ‘भगवान की शरण जानेवाला बड़ी-बड़ी आपदाओं से सुरक्षित हो जाता है। ऐसे तो हमने हमारे जीवन में और हमारे साधक के जीवन में भी कई बार देखा कि जो भगवान के आश्रय लेकर चलते हैं, उनकी बड़ी-बड़ी विपदाएँ भी सम्पदाओं के रूप में बदल जाती हैं। 

– पूज्य बापू जी

ऋषिप्रसाद-फरवरी २०१२