Holi Sandesh

हिरण्यकशिपु की आसुरी वृत्ति के पराभव तथा होलिका रूपी कपट के पराजय का दिन है होली। आज के दिन सत्य, शांति, परमेश्वरीय प्रेम, दृढ़ता की विजय होती है। जो भक्त परम पुरुष परमात्मा में दृढ़ निष्ठावान हैं, उनके आगे प्रकृति अपना नियम बदलती है। अग्नि उन्हें जला नहीं सकती, पानी उन्हें डुबा नहीं सकता, हिंसक पशु उनके मित्र बन जाते हैं। समस्त प्रकृति उनकी दासी बनती है, उनके अनुकूल बनती है……उनकी याद दिलानेवाला यह होली का पवित्र दिन है। मानव को विघ्न-बाधाओं के बीच भी प्रह्लाद की तरह भगवन्निष्ठा टिकाये रखकर संसार से पार होने का संदेश देनेवाला यह दिन है।

ध्यान से अहंकार पिघलता है, चित्त निर्मल बनता है तथा आत्मविश्रांति का द्वार खुलता है। संसार-प्रेम का पल्ला न पकड़ना, ईश्वर का पल्ला पकड़ना। लोभी धन के लिए हँसता-रोता है, मोही परिवार के लिए हँसता-रोता है परंतु भगवान का भक्त तो भगवान के लिए ही हँसता रोता है। वह भगवान को अपना बनाता है। अहंकार का पोषण करने के लिए नहीं किंतु ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए जीवन मिला है, यह बात भूलना नहीं। हिरण्यकशिपु अहंकारी है और भक्त प्रह्लाद शरणागति का स्वरूप है। ईश्वर शरणागति अंत में अहंकार पर विजय दिलाती है। आज तो सबके हृदय में अहंकार की होली है। उसे शांत करने के लिए सत्संग रूपी शरणागति और प्रहलाद जैसी भक्ति करनी चाहिए।

परदुःखकातरता से आत्मबल का विकास होता है। मनुष्य में इतनी शक्ति है कि वह मुर्दे को जीवित कर सकता है। सती सावित्री ने यमराज को प्रसन्न कर अपने मृतक पति को पुनः जीवित किया था। राजा ऋतध्वज ने मदालसा रानी को जीवित किया था। अर्जुन, मुचुकुन्द, खट्वांग, नारद वगैरह स्वर्ग में सदेह आ-जा सकते थे उनके पास स्वर्ग की सीढ़ी थी। आज का मनुष्य भी यदि चाहे तो स्वर्ग में जा सकता है परंतु उसे अपने जीवन को सदाचार, सत्य, परहित-परायणता, सेवा, संयम, निर्भयता आदि पुष्पों से सुशोभित करना चाहिए। भगवान के भक्त को सुख में आसक्त और दुःख में भयभीत नहीं होना चाहिए। प्रह्लाद अग्नि में जला नहीं, समुद्र में डूबा नहीं।

आइये, आज से एक नया जीवन शुरू करें। जो दीन-हीन हैं, शोषित हैं, उपेक्षित हैं, पीड़ित हैं, अशिक्षित हैं, समाज के उस अंतिम व्यक्ति को भी सहारा दें। जिंदगी का क्या भरोसा ? कोई कार्य ऐसा कर लें कि जिससे हजारों हृदय आशीर्वाद देते रहें। चल निकलें ऐसे पथ पर कि जिस पर चलकर कोई दीवाना प्रह्लाद बन जाय।

होली (Holi) अर्थात् हो ली… अर्थात् जो हो गया सो गया… कल तक जो होना था वह हो चुका… उसे भूल जाओ । निंदा हो गयी सो हो गयी, प्रशंसा हो गयी सो हो गयी, जो कुछ हो गया सो हो गया । तुम रहो मस्ती में, आनंद में।