Holi gift

होली के दिन लक्ष्मण जी को श्री राम की चरणसेवा मिली थी । इस बारे में एक लोककथा प्रचलित है :
श्री राम विवाह के बाद अयोध्या पधारे, तब उनकी चरणसेवा लक्ष्मण जी के स्थान पर सीताजी करने लगीं । लक्ष्मण चरणसेवा करने जायें तो सीता जी ना तो नहीं कहतीं लेकिन मर्यादा के अनुसार जब तक वे स्वयं बुलाये नहीं तब तक लक्ष्मण जी को वहाँ जाना उचित नहीं लगता था । अतः लक्ष्मण जी इधर-उधर चक्कर काटते रहते थे । न सीता जी लक्ष्मण जी को बुलातीं और न उन्हें चरणसेवा का मौका मिलता। परिणामस्वरूप लक्ष्मण दुःखी रहने लगे कि प्रभु श्री राम की चरणसेवा न मिले तो जीने का क्या अर्थ ? इसी विचार से उनका शरीर सूखने लगा ।

एक बार राम जी ने पूछा : “लक्ष्मण ! तुम्हारा शरीर क्यों सूखता जा रहा है ?”
लक्ष्मण जी : “प्रभु ! आप तो जानते ही हैं कि मुझे कई दिनों से आपकी चरणसेवा नहीं मिली।” रामजी : “जब तुम मेरी सेवा के लिए यहाँ आने तो तुम्हें कौन ना कहता है ?”

लक्ष्मणजी : “माताजी मुझे देखती तो हैं लेकिन बुलाती नहीं है। मैं आपकी चरणसेवा बिना नहीं जी सकूँगा, प्रभु !”

रामजी : “इसमें मैं क्या कर सकता हूँ ? वह धर्मपत्नी है, उसका प्रथम अधिकार है ।”

लक्ष्मणजी : “प्रभु ! कुछ तो उपाय करें ।”

रामजी : “लखन ! एक उपाय है । चार दिन के बाद होली का त्यौहार आ रहा है । तू तो जानता ही है कि अपने रघुकुल में यह रीति है कि इस दिन देवर भाभी के साथ होली खेलते हैं और शाम को बड़ों की उपस्थिति में देवर भाभी से जो कुछ भी माँगता है वह भाभी को देना ही पड़ता है । इस बार तुम, शत्रुघ्न और भरत सीता के साथ होली खेलकर शाम को सीता से माँगने जाओ, तब अपनी इच्छा पूरी कर लेना ।”

प्रभु की बतायी युक्ति से लक्ष्मण जी नाचने लगे और अधीर होकर कहने लगे : “बस अब होली जल्दी आये ऐसा कुछ करो ।”

रामजी : “होली तो जब आयेगी तभी आयेगी न ।”

लक्ष्मणजी ने तो ‘होली’ का जप करना शुरू कर दिया कि होली जल्दी आये ।

चार दिन पूरे हुए । होली का सूर्योदय हुआ। रंगों के दर्शन होने लगे । सीताजी के साथ लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न पवित्रता से होली खेले । शाम होते ही सर्वप्रथम भरत सीताजी के पास आये और उनके चरण स्पर्श कर बोले : “मुझे तो यह वरदान दीजिये कि मैं जन्म-जन्मांतर तक प्रभु श्रीराम के चरणों में रहूँ, उनकी भक्ति पाऊँ ।”

सीताजी : “तथाऽस्तु।” अर्थात् ऐसा ही हो । फिर शत्रुघ्न की बारी आयी ।

उन्होंने कहा : “भरतजी ने जन्म-जन्मांतर तक प्रभु श्रीराम की भक्ति माँगी है तो मुझे जन्म-जन्मांतर तक भरतजी की भक्ति मिले, मैं उनकी सेवा करूँ । श्रीराम के सेवक का सेवक बनूँ ।”

सीता जी : “तथास्तु ।

तत्पश्चात् सीताजी ने लक्ष्मण जी से कहा : “माँगो ।”

लक्ष्मणजी : “माताजी ! होली की और कोई भेंट तो मुझे नहीं चाहिए, केवल श्री राम की चरण सेवा का अधिकार मेरा बने ।”

प्रभु श्रीराम के चरणों की सेवा का अधिकार माँगने की बात सुनते ही सीताजी बेहोश हो गयीं क्योंकि वे रघुवंश की पुत्रवधु होने से वचन तोड़ नहीं सकती थीं । वैद्यों-हकीमों ने औषधियाँ दीं, फिर भी उनकी मूर्छा न टूटी । तब लक्ष्मण जी दौड़े श्री राम के पास । श्रीराम ने लक्ष्मणजी को एक युक्ति बताई । उसके अनुसार लक्ष्मणजी सीताजी के पास गये और उनके कान में धीरे से कहा : “माताजी ! चरण सेवा के अधिकार में हम दोनों बँटवारा कर लें । दायाँ चरण मेरा और बायाँ चरण आपका । जब आप चरणों की सेवा करने जाओगी तो मुझे सामने से बुला लिया करेंगी ।”

यह सुनकर सीता जी की मूर्च्छा उतर गयी । प्रभु द्वारा बतायी गयी युक्ति से सीता जी और लक्ष्मण, दोनों खुश हो गये ।

➢ लोक कल्याण सेतु, फरवरी 2004