बहुत पहले की बात है। एक बार पूज्य बापूजी हिम्मतनगर आश्रम में रुके हुए थे।

सुबह पूज्यश्री को कहीं दूसरी जगह सत्संग करने जाना था। रसोइया नाश्ते में हलवा बनाकर लाया तो बापूजी बोले ”चलो, रास्ते में गाड़ी में ही नाश्ता कर लेंगे।”

समयाभाव के कारण कभी-कभी पूज्यश्री गाड़ी में ही भोजन-प्रसाद, नाश्ता आदि ले लेते हैं।

गाड़ी चली…….।

हिम्मतनगर शहर से बाहर निकले ही थे कि सड़क के किनारे एक कुत्ता पड़ा हुआ दिखा। उसके दो पैर खराब थे इसलिए वह चल फिर नहीं सकता था। मुँह पर भिनभिनाती मक्खियों को भी उड़ा नहीं सकता था। वह दुबला-पतला, भूखा-प्यासा कुत्ता अत्यंत दीन-हीन दशा में पड़ा था। उसकी वह दशा देखकर ऐसा किसी के भी मन में विचार आ जाय कि ‘मानो-न मानो यह कोई पूर्व जन्मों का बड़ा भारी पाप ही भुगत रहा होगा।’ बापूजी की जैसे ही उस पर दृष्टि पड़ी कि उनका करुणा से भरा हृदय बरस पड़ा। गुरुवर ने गाड़ी रुकवायी।

 रसोइये से कहा ”लाओ, वह हलवा कहाँ है ?”
रसोइये ने डिब्बा दिया तो बोले ”जाओ,उस कुत्ते को हलवा खिलाकर आओ।” क्षणभर के लिए सेवक यह सोचकर ठिठक गया कि ‘गुरुदेव का नाश्ता तो अभी बाकी है और…’

उसके मनोभाव को भाँपकर पूज्य श्री उससे बोले : ”उस कुत्ते में भी तो मैं ही हूँ। इस समय उस शरीर में मुझे आहार की ज्यादा आवश्यकता है।”

 ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की कैसी गजब की अद्वैतनिष्ठा, सर्वात्मदृष्टि होती है। सभी प्राणी उन्हें निजस्वरूप ही प्रतीत होते हैं। ऐसे महाज्ञानी महापुरुषों के लिए गीता (५.१८) में भी आता है।

 विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
 शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥
‘वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी ही होते हैं।’

शास्त्रों के ये वचन बापूजी के जीवन में प्रत्यक्ष हैं। कुत्ते को डंडा खिलाने वाले दुनिया में बहुत होते हैं। उसे रोटी का टुकड़ा डालने वाले लोग भी समाज
में हैं परंतु ऐसी अवस्था में पड़े कुत्ते या प्राणी के प्रति आत्मवत् प्रेम रखनेवाले आत्मनिष्ठ महापुरुष तो कभी-कभी, कहीं-कहीं और अत्यंत विरले होते हैं।  समाज के जो लोग उन्हें पहचान पाते हैं उनका महासौभाग्य है और जो उनका कुप्रचार, उनकी निंदा करते हैं उनका बड़ा दुर्भाग्य है !

 सेवक जब उस कुत्ते को हलवा खिलाकर आया तो बापूजी बोले ”अब मुझे तृप्ति हो गयी !”