peed parayi jaane re

मणिनगर (अहमदाबाद) में एक बालक रहता था । वह खूब निष्ठा से ध्यान-भजन एवं सेवा-पूजा करता था और शिवजी को जल चढाने के बाद ही जल पीता था । एक दिन रास्ते में उसे एक व्यक्ति बेहोश पड़ा हुआ मिला। पूजा-अर्चना छोड़कर वह उस की सेवा में लग गया ।

वह बोला : ‘‘पानी… पानी…”

बालक ने महादेवजी के लिए लाया हुआ जल उसे पिला दिया । फिर दौड़कर  घर गया और दूध लाकर दिया।

युवक ने कहा : ‘‘बाबूजी ! मैं बिहार से आया हूँ । मेरे पिता गुजर गये हैं और काका दिन-रात टोकते रहते थे कि ‘कुछ कमाओगे नहीं तो खाओगे क्या ! नौकरी-धंधा मिल नहीं रहा था । भटकते भटकते अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुँचा और कुली का काम करने का प्रयत्न किया । अपनी रोजी-रोटी में नया हिस्सेदार मानकर कुलियों ने मुझे खूब मारा । पैदल चलते-चलते आ रहा था कि चक्कर आया और यहाँ गिर गया ।”

बालक ने उसे खाना खिलाया, फिर अपना जेबखर्च का पैसा दिया । उसको जहाँ जाना था वहाँ भेजने की व्यवस्था की ।

अंदर से आवाज आयी : ‘बेटा ! अब मैं तुझे जल्दी मिलूँगा… बहुत जल्दी मिलूँगा ।’

बालक ने प्रश्न किया : ‘अंदर से कौन बोल रहा है ?’

उत्तर आया : ‘जिस शिव की तू पूजा करता है वह तेरा आत्मशिव ।’

अब मैं तेरे हृदय में प्रकट होऊंगा । सेवा के अधिकारी की सेवा मुझ शिव की ही सेवा है।

कुछ वर्षों के बाद वह तो घर छोड़कर निकल पड़ा । केदारनाथ, वृंदावन होते हुए वह नैनीताल के अरण्य में पहुँचा । परम पूज्य सद्गुरु स्वामी श्री लीलाशाहजी बापू की राह देखते हुए उसने वहाँ चालीस दिन बिताये । गुरुवर लीलाशाहजी बापू को अब पूर्ण समर्पित शिष्य मिला… पूर्ण खजाना प्राप्त करने की क्षमतावाला पवित्रात्मा मिला… पूर्ण गुरु को पूर्ण शिष्य मिला… । स्वामी लीलाशाहजी बापू के श्रीचरणों में आत्मविचार का आश्रय लेनेवाले इस युवक ने उनकी पूर्ण कृपा प्राप्त कर आत्मज्ञान प्राप्त किया ।

जानते हो वह युवक कौन था ???

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान । आसुमल से हो गये, साईं आशाराम ।

लाखों-करोडों लोगों के इष्ट-आराध्य प्रातःस्मरणीय जग-वंदनीय पूज्य संत श्री आशारामजी बापू !