सन् २००१ में दिल्ली के ‘टॉक्सिक लिंक’ तथा ‘वातावरण’ नामक संगठनों ने अध्ययन के दौरान पाया कि आजकल होली के रंग जिन तीन रूपों में आते हैं (पेस्ट, सूखे रंग (Gulal) और पानी के रंग) वे तीनों ही शरीर के लिए खतरा पैदा करते हैं। पेस्टों में जहरीले रसायन होते हैं, जिनसे स्वास्थ्य के लिए होने सम्भाव्य खतरे निम्न प्रकार हैं:

सूखे रंगों में ‘एस्बेस्टस’ या ‘सिलिका’ होते हैं, ये दोनों ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। गीले रंगों में ‘जेंसियन वॉयलेट’ का प्रयोग होता है, जिससे त्वचा बदरंग होने तथा ‘डर्मेटाइटिस’त्वचारोग होने का खतरा पैदा होता है। लखनऊ स्थित ‘इंडस्ट्रियल टॉक्सिक रिसर्च सेंटर’ के उपनिदेशक डॉ. मुकुल दास के अनुसार होली के अवसर पर प्रयुक्त अधिकांश रंग रासायनिक पदार्थों तथा अभक्ष्य पदार्थों जैसे कपड़ा, कागज, चमड़े आदि से बने होते हैं।
कृत्रिम रंग बनाने हेतु विभिन्न रसायन इस्तेमाल होते हैं, जैसे – गुलाबी व लाल रंग बनाने हेतु ‘रोडमिना’, हरे रंग हेतु ‘मेलाकाइट’, बैंगनी रंग हेतु ‘मेथिल वायलेट’, संतरी रंग हेतु ऑरेंज -II’ तथा पीले रंग हेतु ‘ऑरामाइन’ इस्तेमाल होता है । ये सभी स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। कई दुकानदार ऐसे रंग भी बेचते हैं जिन पर साफ तौर पर लिखा होता है : ‘केवल औद्योगिक उपयोग के लिए’, फिर भी लोग उनसे होली खेलते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिप्रद है।
प्राकृतिक रंगों की महत्ता बताते हुए डॉक्टर दास कहते हैं कि ‘होली के समय ऋतु-परिवर्तन के प्रभाव से हानिकारक असंतुलन उत्पन्न हो जाते हैं । प्राकृतिक रंग अपने विशिष्ट गुणों के कारण सूर्य-प्रकाश की उपस्थिति में इन विकृतियों को नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं।’
अतः रासायनिक रंगों की हानियों से बचने के लिए प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें।