▪न्यायाधीश गुरुदास सिंह, उच्च न्यायालय में वादी-प्रतिवादी को सुन रहे थे । इतने में एक वृद्धा जीर्ण-शीर्ण वस्त्र पहने न्यायालय के द्वार पर पहुँची । गंगा-स्नान करके आयी उस वृद्धा के वस्त्र गीले थे ।

▪न्यायालय के द्वार पर उसे चपरासी ने रोक दिया । वृद्धा ने कहा : ‘‘न्यायाधीश गुरुदास कहाँ मिलेंगे ? तुम मुझे गुरुदासजी के दर्शन कराओ, नहीं तो मैं यहीं प्राण छोड़ दूँगी ।”
चपरासी ने देखा कि वृद्धा की भावना बड़ी तीव्र हैं और बोलती भी बड़े प्यार से है ।

▪उसने न्यायाधीश गुरुदासजी से कहा : ‘‘साहब ! एक गरीब वृद्धा, जिसके कपड़ों का ठिकाना नहीं है, शरीर पर झुर्रियाँ पड़ी हुई हैं, आपका नाम ले रही है कि मुझे गुरुदासजी से मिलाओ ।

▪गुरुदासजी विचारने लगे कि कौन होगी ? द्वार पर जाकर देखा तो ‘ओहोऽऽऽ… मैं जब शिशु था तब यह वृद्धा मुझे दूध ठंडा करके पिलाया करती थी । यह हमारे घर में सेवा करने आती थी ।

▪न्यायाधीश ने उसे प्रणाम किया और बड़े आदर से न्यायालय में ले आये । वृद्धा क्या जाने कि न्यायाधीश का पद कितना ऊँचा होता है ? वृद्धा ने कहा : ‘‘बेटा गुरुदास ! मैं तो चली थी गाँव से । तेरी बहुत याद आती थी तो गंगा नहाकर तुझे देखने आ गयी हूँ, मेरे लाल !

▪गुरुदासजी सिंह की आँखों में पानी आ गया । उन्होंने उस वृद्धा को आदर से बिठाया और उपस्थित लोगों से कहा : ‘‘जो मुझे बचपन में गाय का दूध ठंडा करके पिलाती थीं, मेरी वह माँ आयी है।गुरुदासजी जब धाय माँ अथवा सेविका का इतना उपकार मानते थे तो अपनी माँ स्वर्णमणि देवी का कितना उपकार मानते होंगे !

▪विद्यार्थी चाहे कितना भी बड़ा न्यायाधीश, वकील, नेता, उद्योगपति या संत हो जाय किंतु माँ के आगे तो वह बेटा ही है ।
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता ।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत् ।।
(पद्य पुराण, सृष्टि खंड : 47.13)
माता का आदर भूमंडल के समस्त तीर्थों की परिक्रमा का फल देता है । जिसने माता का आदर किया समझो, उसने पृथ्वी के सभी तीर्थों का आदर कर लिया । जिसने पिता का आदर किया समझो, उसने ब्रह्मलोक तक के सभी लोकों का आदर कर लिया ।