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divine valentines day
Divine Valentine's Day [Matru Pitru Pujan Divas] 14th February
14 February को वैलेंटाइन्स डे (Valentine's Day) नहीं बल्कि मातृ-पितृ पूजन दिवस मनाया जा रहा है. Matru Pitru Poojan Diwas (MPPD) also named Parents' Worship Day

विश्वमानव को एक नयी दिशा....

  • सभी लोग अपने माता पिता का सत्कार करें। भारत में और विश्व में ʹमातृ-पितृ पूजन दिवसʹ का कार्यक्रम मैं व्यापक करना चाहता हूँ। इस दिन बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता का आदर-पूजन करें और प्रणाम करें तथा माता-पिता अपनी संतानों को प्रेम करें। इससे वास्तविक प्रेम का विकास होगा।
  • हृदय की विकारी वासनाओं को प्रेम का जामा देना, प्रेम को बदनाम करना है। प्रेम और काम में बहुत अंतर है। काम नीचे के केन्द्रों में है। वह उत्तेजना और अँधापन पैदा करता है, विकार पैदा करता है और प्रेम ऊपर के केन्द्रों में है, वह सूझबूझ पैदा करता है, नित्य नवीन रस पैदा करता है, प्राणिमात्र में अपनत्व दिखाता है। केवल हिन्दुस्तान उन्नत हो ऐसा नहीं अपितु पूरा मानव-समाज…. पूरा विश्व इस काम-वासना की अंधी आँधी से बचकर संयमी, सदाचारी, स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन की राह पर चले और विश्व का मंगल हो क्योंकि हमें विरासत में वही मिला है।

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू का परम हितकारी संदेश !

माता-पिता ने हमसे अधिक वर्ष दुनिया में गुजारे हैं, उनका अनुभव हमसे अधिक है और सदगुरु ने जो महान अनुभव किया है उसकी तो हमारे छोटे अनुभव से तुलना ही नहीं हो सकती। इन तीनों के आदर से उनका अनुभव हमें सहज में ही मिलता है। अतः जो भी व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता है, उस सज्जन को माता-पिता और सदगुरु का आदर पूजन आज्ञापालन तो करना चाहिए, चाहिए और चाहिए ही ! 14 फरवरी को ʹवेलेंटाइन डेʹ मनाकर युवक-युवतियाँ प्रेमी-प्रेमिका के संबंध में फँसते हैं। वासना के कारण उनका ओज-तेज दिन दहाड़े नीचे के केन्द्रों में आकर नष्ट होता है। उस दिन ʹमातृ-पितृ पूजनʹ काम-विकार की बुराई व दुश्चरित्रता की दलदल से ऊपर उठाकर उज्जवल भविष्य, सच्चरित्रा, सदाचारी जीवन की ओर ले जायेगा।
माता-पिता के पूजने से अच्छी पढाई का क्या संबंध-ऐसा सोचने वालों को अमेरिका की ʹयूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनियाʹ के सर्जन व क्लिनिकल असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सू किम और ʹचिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल ऑफ फिलाडेल्फिया, पेंसिल्वेनियाʹ के एटर्नी एवं इमिग्रेशन स्पेशलिस्ट जेन किम के शोधपत्र के निष्कर्ष पर ध्यान देना चाहिए। अमेरिका में एशियन मूल के विद्यार्थी क्यों पढ़ाई में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करते हैं ? इस विषय पर शोध करते हुए उऩ्होंने यह पाया कि वे अपने बड़ों का आदर करते हैं और माता-पिता की आज्ञा का पालन करते हैं तथा उज्जवल भविष्य-निर्माण के लिए गम्भीरता से श्रेष्ठ परिणाम पाने के लिए अध्ययन करते हैं। भारतीय संस्कृति के शास्त्रों और संतों में श्रद्धा न रखने वालों को भी अब उनकी इस बात को स्वीकार करके पाश्चात्य विद्यार्थियों को सिखाना पड़ता है कि माता-पिता का आदर करने वाले विद्यार्थी पढ़ाई में श्रेष्ठ परिणाम पा सकते हैं।
एक बार भगवान शंकर के यहाँ उनके दोनों पुत्रों में होड़ लगी कि, कौन बड़ा? निर्णय लेने के लिए दोनों गय़े शिव-पार्वती के पास। शिव-पार्वती ने कहाः जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुँचेगा, उसी का बड़प्पन माना जाएगा। कार्तिकेय तुरन्त अपने वाहन मयूर पर निकल गये पृथ्वी की परिक्रमा करने। गणपति जी चुपके-से एकांत में चले गये। थोड़ी देर शांत होकर उपाय खोजा तो झट से उन्हें उपाय मिल गया। जो ध्यान करते हैं, शांत बैठते हैं उन्हें अंतर्यामी परमात्मा सत्प्रेरणा देते हैं। अतः किसी कठिनाई के समय घबराना नहीं चाहिए बल्कि भगवान का ध्यान करके थोड़ी देर शांत बैठो तो आपको जल्द ही उस समस्या का समाधान मिल जायेगा। फिर गणपति जी आये शिव-पार्वती के पास। माता-पिता का हाथ पकड़ कर दोनों को ऊँचे आसन पर बिठाया, पत्र-पुष्प से उनके श्रीचरणों की पूजा की और प्रदक्षिणा करने लगे। एक चक्कर पूरा हुआ तो प्रणाम किया…. दूसरा चक्कर लगाकर प्रणाम किया…. इस प्रकार माता-पिता की सात प्रदक्षिणा कर ली।

एक विश्वव्यापी पर्व ....

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Countries

देशो ने इसे विश्व में स्वीकारा

1 Mn +
People

से अधिक विद्यार्थी, माता-पिता और जनमानस ने कार्यक्रम में भाग लिया 

1 +
Cities

से अधिक कसबे , गाँव व् शहरों में मनाया गया

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Schools and Societies

से अधिक विद्यालयों और सोसाइटी में कार्यक्रम हुए

मातृ पितृ पूजन दिवस की कुछ झलकें ....

Matri Pitri Poojan Diwas
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मातृ-पितृ पूजन दिवस

पूजन की विधिः
पूजन कराने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे विधि बोलता जाये और निम्नलिखित मंत्रों एवं आरती का मधुर स्वर में गायन करता जाय। तदनुसार बच्चे और माता-पिता पूजन को सम्पन्न करेंगे। माता-पिता को स्वच्छ तथा ऊँचे आसन पर बिठायें।

आसने स्थापिते ह्यत्र पूजार्थं भवरोरिह। भवन्तौ संस्थितौ तातौ पूर्यतां मे मनोरथः।।

अर्थात् ʹहे मेरे माता पिता ! आपके पूजन के लिए यह आसन मैंने स्थापित किया है। इसे आप ग्रहण करें और मेरा मनोरथ पूर्ण करें।ʹ बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता के माथे पर कुंकुम का तिलक करें।

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।।

तत्पश्चात् माता-पिता के सिर पर पुष्प एवं अक्षत रखें तथा फूलमाला पहनायें। अब माता-पिता की सात परिक्रमा करें। इससे उऩ्हें पृथ्वी परिक्रमा का फल प्राप्त होता है। बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता को झुककर विधिवत् प्रणाम करें।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्।।

अर्थात् जो माता पिता और गुरु जनों को प्रणाम करता है और उऩकी सेवा करता है, उसकी आयु, विद्या, यश और बल चारों बढ़ते हैं। (मनुस्मृतिः 2.121)

दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोઽस्तु ते।। (आरती की तर्ज - ૐ जय जगदीश हरे....)

बच्चे-बच्चियाँ थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की आरती करें और अपने माता-पिता एवं गुरु में ईश्वरीय भाव जगाते हुए उनकी सेवा करने का दृढ़ संकल्प करें।

पूज्य बापू जी का परम मंगलकारी संदेश

पूजन-विधि हो जाय तब बच्चे थोड़ी देर चुप बैठें। माँ बाप बच्चों को देखें और मन ही मन उनके प्रति आत्मकृपा बरसा रहे हों, उन मिनटों में बच्चे के आदर से, सदभाव से माँ-बाप की तरफ देखें और चिंतन करें कि उनका अंतर्यामी परमात्मा हम पर आशीर्वाद बरसा रहा है, अपना शुभ आशीष बरसा रहा है। इससे तुम्हारा मंगल होगा बेटे-बेटियो ! माँ-बाप ऐसे ही तुम्हारा मंगल चाहते हैं और इस दिन तो विशेष कृपा बरसाते हैं। माँ-बाप बच्चों को आशीर्वाद दें कि इनका मंगल हो। बाद में माँ-बाप भी बच्चों को तिलक करें, सिर पर हाथ घुमायें, शुभ आशीष दें। माता-पिता अपनी संतान को प्रेम से सहलायें। संतान अपने माता-पिता के गले लगे। बेटे-बेटियाँ माता-पिता में ईश्वरीय अंश देखें और माता-पिता बच्चों में ईश्वरीय अंश देखें।

मातृ-पितृ पूजन दिवस

पूजन की विधिः

आसने स्थापिते ह्यत्र पूजार्थं भवरोरिह।
भवन्तौ संस्थितौ तातौ पूर्यतां मे मनोरथः।।

  • अर्थात् ʹहे मेरे माता पिता ! आपके पूजन के लिए यह आसन मैंने स्थापित किया है। इसे आप ग्रहण करें और मेरा मनोरथ पूर्ण करें।ʹ बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता के माथे पर कुंकुम का तिलक करें।

Matru-Pitru-Poojan-3.jpg
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यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे।।

  • अर्थात् ʹहे मेरे माता पिता ! आपके पूजन के लिए यह आसन मैंने स्थापित किया है। इसे आप ग्रहण करें और मेरा मनोरथ पूर्ण करें।ʹ बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता के माथे पर कुंकुम का तिलक करें।

दीपज्योतिः परं ब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोઽस्तु ते।।

  • बच्चे-बच्चियाँ थाली में दीपक जलाकर माता-पिता की आरती करें और अपने माता-पिता एवं गुरु में ईश्वरीय भाव जगाते हुए उनकी सेवा करने का दृढ़ संकल्प करें।

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पूज्य बापू जी का परम मंगलकारी संदेश

पूजन-विधि हो जाय तब बच्चे थोड़ी देर चुप बैठें। माँ बाप बच्चों को देखें और मन ही मन उनके प्रति आत्मकृपा बरसा रहे हों, उन मिनटों में बच्चे के आदर से, सदभाव से माँ-बाप की तरफ देखें और चिंतन करें कि उनका अंतर्यामी परमात्मा हम पर आशीर्वाद बरसा रहा है, अपना शुभ आशीष बरसा रहा है। इससे तुम्हारा मंगल होगा बेटे-बेटियो ! माँ-बाप ऐसे ही तुम्हारा मंगल चाहते हैं और इस दिन तो विशेष कृपा बरसाते हैं। माँ-बाप बच्चों को आशीर्वाद दें कि इनका मंगल हो। बाद में माँ-बाप भी बच्चों को तिलक करें, सिर पर हाथ घुमायें, शुभ आशीष दें। माता-पिता अपनी संतान को प्रेम से सहलायें। संतान अपने माता-पिता के गले लगे। बेटे-बेटियाँ माता-पिता में ईश्वरीय अंश देखें और माता-पिता बच्चों में ईश्वरीय अंश देखें।

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