एक सत्संगी माँ अपने बालक को सीख देती कि “बेटा ! कभी किसी को ना सताना । किसी के प्रति मन में भेदभाव ना रखना । निर्धनों की सहायता करना। सबको अपना मान के सबसे स्नेह करना । भगवान तुमसे बड़े प्रसन्न रहेंगे ।”

उस बालक ने माँ की सीख गांठ बांध ली । एक दिन घर की नौकरानी का बालक भी उस बच्चे के पास खड़ा था तो माँ ने उसे दो मिठाइयां देकर कहा : “एक इस बालक को देना दूसरी तुम खा लेना ।”

माँ ने उसे जो दूसरी मिठाई दी, वह पहले वाली से बड़ी थी । पर माँ के उस सपूत ने दूसरी वाली अपनी बड़ी मिठाई नौकरानी के बालक को दे दी और स्वयं छोटी वाली खाई । माँ ने यह देखा तो पूछा : “तुमने बड़ा टुकड़ा, जो तुम्हें खाने को दिया था, उसे क्यों दे दिया ?”

बालक : ‘माँ आप ही तो कहती हैं सब हमारे हैं, निर्धन बच्चों को भी अपने भाई- बंधु समझना, सबसे स्नेह करना।’ तब यदि मैंने अपनी मिठाई उसे दे दी और उसकी वाली स्वयं खाली तो इसमें हानि क्या है ?”

बालक की बात से गदगद हो माँ ने उसे हृदय से लगा लिया, बोली : “मेरे लाल ! तुमने अच्छा ही किया । सदैव इसी प्रकार सभी से स्नेह करना, सबको अपना समझना । सब के रूप में एक ईश्वर ही तो है ! तुम अवश्य महान होओगे और सभी लोग तुम्हें प्यार- आदर देंगे । सज्जन आशीर्वाद देंगे । परमात्मा प्रसन्न होंगे ।”

आगे चलकर यह एक देशभक्त एवं महान विद्वान न्यायमूर्ति महादेव गोविंद रानाडे के नाम से सुप्रसिद्ध हुए, जो लोगों के बड़े स्नेह व आदर के पात्र थे । 

दूसरा और यह प्रसंग भी आपने पढ़ा- सुना होगा : एक माँ का बेटा विद्यालय जाता और किसी की कलम चुरा लाता, तो किसी का कुछ सामान । चोरी करने की बात पता चलने पर भी माँ बालक को रोकती- टोकती नहीं थी, बल्कि कहती : “बेटा ! तू तो बड़ा चालाक है ।’ 

माँ की ऐसी कुशिक्षाओं से बालक का स्वभाव बिगड़ता गया । वह बड़ा होकर बड़ी – बड़ी चोरियां करने लगा, लूटपाट, मारकाट, हत्याएं भी करने लगा । समय पाकर वह राज्य का सबसे कुख्यात डाकू बना । आखिर वह एक दिन पकड़ा गया और उसे फांसी की सजा सुनाई गई ।

जब उससे अंतिम इच्छा पूछी गई तो उसने कहा : ‘मेरी माँ को बुलाओ ।’ वैसा किया गया । डाकू के हाथ बंधे थे । माँ को देखते ही उसने कहा : ‘माँ ! मैं तेरे कान में कुछ कहना चाहता हूं, मेरे नजदीक आ ।’

माँ उसके करीब गई तो उसने माँ का कान ऐसा काटा की कटा हुआ टुकड़ा उसके मुंह में आ गया । उसने उसे थूक दिया । माँ चिल्लाई ।

डाकू से ऐसा करने का कारण पूछा गया तो वह माँ को बोला : माँ ! तेरी वजह से ही आज मैं फांसी पर लटकने जा रहा हूं । यदि तूने मुझे बचपन में ही चोरी करने पर शाबाशी देकर लाड लड़ाने के बजाय सही सीख दी होती और जरूरत पड़ने पर दो थप्पड़ भी लगा दिए होते तो मेरे यह हाल ना होते और आज मैं एक सज्जन व्यक्ति होता ।” कुशिक्षा देने वाली उस माँ का कान ही नहीं बल्कि समाज में नाक भी कट गई ।

न्यायमूर्ति रानाडे की माँ को धन्यवाद उस क्षण भी फलित हुआ और आज भी हो रहा है और आगे भी होता रहेगा । जब- जब कोई पाठक यह प्रसंग पढ़ेगा और उस लुटेरे की माँ की नाक उस दिन भी कटी और आज भी आपके – हमारे सामने कट रही है और आगे भी कटती रहेगी जब- जब कोई यह पढ़ेगा ।

हे देवियों ! आप कैसी माँ बनना चाहेंगी ? आप अपना बेटा कैसा देखना चाहेंगी ? देश को कैसा व्यक्तित्व देंगी– एक महापुरुष अथवा कोई डाकू- लुटेरा … ?

वस्तु या व्यक्ति एक-के-एक परंतु महत्व इसका है कि उसे संग और संस्कार कैसे मिलते हैं ।

धूल पानी का संग पाकर कीचड़ हो जाती है, पैरों तले रौंदी जाती है, दूसरों को गंदा कर देती है और दलदल में फंसा के विनष्ट कर देती है और वही धूल संतों के चरणों को छू जाती है तो उसे अपने सिर पर धारण करने के लिए भगवान भी लालायित होकर संतों के पीछे- पीछे जाते हैं ।

भगवान उद्धव जी से कहते हैं :

मैं संतन के पीछे जाऊं, जहाँ जहाँ संत सिधारे ।

चरणन रज निज अंग लगाऊँ, शोधूँ गात हमारे ।।

उधो ! मोहे संत सदा अति प्यारे ।

उधो ! मोहे संत सदा अति प्यारे ।…

– ऋषि प्रसाद, जनवरी 2019