गृहस्थ दंपति के लिए ब्रह्मचर्य-व्रत की सफलता हेतु निम्नलिखित नियमों का पालन करना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा :

* पति-पत्नी को अलग-अलग कमरों में सोना चाहिए और सम्पूर्ण एकांत में साथ-साथ नहीं रहना चाहिए ।

* पारिवारिक प्रार्थना : दोनों को अथवा परिवार के सभी लोगों को साथ मिलकर दिन में दो बार प्रार्थना-स्तवन, शास्त्र-पठन आदि करना चाहिए । इससे पति-पत्नी एक-दूसरे को भोग के साधन के रूप में न देखकर जगतरूपी धर्मशाला में कुछ समय के लिए मिलनेवाले दो पथिकों के रूप में अनुभव करेंगे । इससे पति-पत्नी के बीच भोगप्रधान संबंध छूट जायेगा और परस्पर निर्मल, दिव्य प्रेमसंबंध सरलता से जन्मेगा व स्थिर होगा ।

* भूतकाल की रतिक्रीडाएँ और शृंगार-चेष्टाओं की स्मृति को मिटा देना चाहिए ।

* एक-दूसरे को स्त्री या पुरुष रूप में देखने के बदले देह के साथ रहनेवाले देही (परमात्मा) रूप में देखने का प्रयत्न करना चाहिए ।

* शरीर और मन को निरन्तर सत्कार्य या सेवाकार्य में जोडे रखना चाहिए । अपने इष्टमंत्र के जप में मन को रत रखना चाहिए । इससे कामवृत्ति नहीं जगेगी, साथ ही कामवासना पर विजय करानेवाली आध्यात्मिक शक्ति बढती जायेगी ।

* संयमी जीवन शुरू करने पर पति को कभी स्वप्नदोष हो जाय तो उसे क्षुब्ध नहीं होना चाहिए । इस समय पत्नी के साथ क्रीडा कर लेना उचित है, ऐसा समझना योग्य नहीं है । ऐसा सोचने पर तो ब्रह्मचर्य की उपासना हो ही नहीं सकती ।

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